काम कला काली पूजन मंत्र बलि

॥ अथ कामकलाकालि पूजाऽर्चा विधानम् ॥
बलि विधान शिव बलि

पूर्वोक्त ध्यान मन्त्रों से देवी का आवाहन कर षोडशोपचार से पूजन कर बलि प्रदान करें ।

आवाहन – ॐ ह्रीं क्लीं आं कामकलाकालि देवि आगच्छ आगच्छ तिष्ठ तिष्ठ पूजां गृहाण गृहाण स्वाहा।

आवाहन कर पुष्पांजलि प्रदान करें – एष पुष्पाञ्जलिः क्लीं कामकलाकाल्यै नमः ।

अर्घ्यादि प्रदान करें – ॐ आं हूं ह्रीं स्फ्रों श्मशानवासिन्यै कामकलाकाल्यै एषोऽर्घो नमः ।

अन्य उपचार कर अनङ्ग गंधादि दान करें –

ॐ ऐं हौं श्रीं हूं क्लीं ठः ह्रीं आं रतिप्रियायै कामकलाकाल्यै एष अनङ्गगन्धः नमः ।

स्वयम्भुकुसुमार्पण मन्त्रः –

ॐ ह्रीं क्लूं कामकलाकाल्यै हूं आं भगमालिन्यै ऐं स्त्रीं भगप्रियायै ठः श्री मदनातुरायै इदं स्वयंभूकुसुमं नमः ।

(यहां अनङ्गगंध दान का अर्थ कन्या के प्रथम दिन के रज से है ।

इसी तरह पुरुष के बिन्दु अर्थ स्वयम्भुकुसुम कहा गया है।)

अष्टादशवार्षिक्यास्ततो न्यूनवयस्काया युवत्या विवाहिताऽविवाहितासाधारण्या ऋतुमत्याः प्रथमदिन संभवं रज: अनङ्गगंधतयेह अभिमताम् ॥

पूजायां बल्यर्पणस्य मन्त्र :-

ॐ क्लीं क्लीं क्लीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं ह्रां ह्रीं ह्रूं भगप्रिये भगमालिनि महाबलिं गृह्ण गृह्ण भक्षय भक्षय मम शत्रून् नाशय नाशय उच्चाटय उच्चाटय हन हन त्रुट त्रुट छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय मारय मारय द्रावय द्रावय ह्रीं स्वाहा ।

भोजने बल्यर्पण मन्त्र :-
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रं ह्रं क्षौं क्षौं स्फ्रों स्फ्रों आं आं क्लीं क्लीं कामकलाकालि महाकामातुरे महाकालप्रिये मयानिष्टं निवारय निवारय शत्रून् स्तंभय स्तंभय मारय मारय दम दम मर्दय मर्दय शोषय शोषय इमं बलिं गृह्ण गृह्ण खादय खादय हूँ स्वाहा ।।

॥ अथ यंत्रावरण पूजनम् ॥

वज्रदल में पद्म उल्टा बनता है अर्थात् पद्म के पत्रों का मुंह अन्दर की ओर करके बनता है । पूजा यंत्र हेतु एक के ऊपर एक करके ३ त्रिकोण बनाये, उनके ऊपर अष्टदल बनाये उसके बाद अष्टवज्रदल पश्चात् चार द्वार युक्त भूपूर बनाये ।

यंत्रोद्धार इस प्रकार है – भूपुरे वसुवज्राढ्ये पद्ममष्ट दलान्वितम् । केसरणि प्रकल्प्यानि तत्रान्तश्चापि कर्णिका ॥ कर्णिकान्तस्त्रिकोणस्य त्रितयं पृथगेव हि । वहिस्त्रिकोण कोणेषु लिखेद् बीजत्रयं शुभम् ॥ मायाबीजं तु वामे स्यात् क्रोधबीजं च दक्षिणे । अधः पाशं विनिर्दिश्य कन्दर्पणं तु मध्यतः ॥ तदन्तः स्थापिनी देवी तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् । एतद् यंत्रं महादेवि सर्वकाम फलप्रदम् ॥ अर्थात् बाहरी त्रिकोण के वामभाग में ‘‘ह्रीं” दक्षिण कोण में “हूं” नीचे के कोण में “आं” एवं मध्य में ‘‘क्लीं” लिखें । यंत्र को शुद्धकर दक्षिण कालिका २२ अक्षरवत् नव पीठ देवियों का पूजन करें । मूलमंत्र व ध्यान युक्त देवी का आवाहन करे । कल्पान्तकारिणीं काली महारौरव रूपिणीम् । महाभीमां दुर्निरीक्ष्यां सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ शत्रुपक्ष क्षयकरीं दैत्यदानव सूदनीम् । चिन्तये दीदृशीं देवीं काली कामकलाऽभिधाम् ॥ प्रथमावरणार्चनम् :-  गुरु मण्डल का पूजन करे । पश्चात् क्लां, क्लीं, क्लूं, क्लैं, क्लौं, क्लः से हृदय, शिर, शिखा, कवच एवं अस्त्रशक्ति का पूजन यंत्र में मध्यभाग में करे । देवि से यंत्रार्चन की आज्ञा मांगे । दिव्यौघादि गुरु संबंध में काली कुल या गुह्यकाली में उल्लिखित दिव्यौघ का पूजन करें । मध्य बिन्दु में देवि का पूजन करें ।

द्वितीयावरणार्चनम् :- (बाहरी त्रिकोण) कोणों के बाहर –

ॐ संहारिण्यै नमः ।
ॐ भीषणायै नमः ।
ॐ मोहिन्यै नमः ।
(कोणों के अन्दर)
ॐ कुरुकुल्लायै नमः ।
ॐ कपालिन्यै नमः ।
ॐ विप्रचित्तायै नमः ।

तृतीयावरणार्चनम् :-  (मध्य त्रिकोण में) कोणों के बाहर – ॐ उग्रायै नमः ।
ॐ उग्रप्रभायै नमः ।
ॐ दीप्तायै नमः ।

(कोणों के अन्दर)

ॐ नीलायै नमः ।
ॐ घनायै नमः ।
ॐ बलाकायै नमः ।
चतुर्थावरणार्चनम् :- (अन्तः त्रिकोणे) प्रत्येक कोण में ३-३ देवियों का पूजन करें (वामकोणे) –

ॐ ब्राह्यै नमः । ॐ नारायण्यै नमः । ॐ माहेश्वर्यै नमः । (दक्षिणकोणे)
ॐ चामुण्डायै नमः । ॐ कौमार्यै नमः । ॐ अपराजितायै नमः ।
(अध: कोणे)
ॐ वाराह्ये नमः । ॐ नारसिंह्यै नमः । ॐ इन्द्राण्यै नमः । पंचमावरणार्चनम् :-  (अष्टदले केसरेषु) –

ॐ असिताङ्ग भैरवाय नमः । ॐ रुरु भैरवाय नमः ।

ॐ चण्ड भैरवाय नमः । ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः ।

ॐ क्रोध भैरवाय नमः । ॐ कपाली भैरवाय नमः ।
ॐ भीषण भैरवाय नमः । ॐ संम्मोहन भैरवाय नमः ।

षष्ठमावरणार्चनम् :- (अष्टदल मध्ये) अष्ट क्षेत्रपाल का पूजन करें –
ॐ एकपादाय नमः ।
ॐ विरूपाक्षाय नमः । ॐ भीमाय नमः ।

ॐ सङ्कर्षणाय नमः । ॐ चण्डघण्टाय नमः ।

ॐ मेघनादाय नमः । ॐ वेगमालाय नमः ।
ॐ प्रकम्पनाय नमः ।
सप्तमावरणार्चनम् :– (अष्टदले कर्णिकायां)

अष्टयोगिनी पूजन करें –
ॐ उल्कामुख्यै नमः । ॐ कौटराक्ष्यै नमः ।

ॐ विद्युजिह्वायै नमः । ॐ करालिन्यै नमः ।
ॐ वज्रोदर्यै नमः । ॐ तापिन्यै नमः ।
ॐ ज्वालायै नमः । ॐ जालन्धर्यै नमः ।

अष्टमावरणार्चनम् :- (दशसु दिक्षु) यहां महाकाल संहिता कामकलाखण्ड में रुद्रादिलोकपालों के अलावा अन्य देवताओं के नाम नहीं दिये हैं ।

परन्तु गुह्यकाली में इन्द्रादि लोकपाल, दिग्गज, आदित्य, पितर, नाग, यक्षादि का पूजन दिया गया है ।

पश्चात् पुष्पाञ्जलि प्रदान करे ।

ॐ अभीष्ट सिद्धिं मे देही शरणगत वत्सले । भक्त्या समर्पये तुभ्यं अमुकावरणार्चनम् ।।

(लोकपालस्तत एवावगन्तव्यस्तत्र चादित्याः पितरः दिङ्नागा: यक्षाश्च पूर्व दक्षिण पश्चिमोत्तराशाधिपाः सिद्धाः यातुधानाः साध्या रुद्राश्चाग्नेय नैऋत्यवायव्यैशान विदिशा विदिशार्माधिपाः ।

उर्ध्वदिशः क्षेत्रपालाः अधोदिशश्च मातर अधिष्ठानं कुर्वन्ति । एत एव लोकपाला इति ध्येयम्)
बिन्दु पूजनम् – त्रिकोण मध्य में भैरव सहित मुख्य देवता का मूल मन्त्र सहित पूजन करें ।

कामकलाकाली पूजा अनन्तर गणेश, सूर्य, विष्णु एवं शिव की पूजा करें ।

पूजा कर बलि प्रदान करें ।

॥ मन्त्र पुरश्चरण विधि ॥

साधक भूमि शुद्धि करके भूमि का खनन कर नृमुण्ड स्थापित करें ।

मन्त्र :- ॐ हूं ह्रीं आं क्लीं स्फ्रों सिद्धिं देहि देहि स्वाहा ।

उस पर आसन बिछाकर नरास्थि माला से जप करें । पात्रा सादन करें। तदनन्तर तिरस्करणी दुर्गा का पूजन करें ।
मन्त्र :-
ऐं ऐं ऐं ऐं श्रीं ह्रीं हूं क्लीं स्त्रीं फ्रें फ्रें खफ्रक्षूं खफ्रक्षैं फ्रखभ्रूं फ्रखभ्रीं फ्रम्रग्लूं रकक्ष्रैं रकक्ष्रौं तिरस्करिणि सकलजनवाग्वादिनि सकलपशुजनवाक् चक्षुः श्रोत्र घ्राण जिह्वा वचस्तिरस्कारं कुरु कुरु फट् फट् ।

सुन्दरी पूजन करें, मण्डल की रचना करें । शिवा बलि प्रदान करें । कामकला गायत्री मन्त्र का जप करें ।

ॐ अनङ्गाकुलायै विद्महे मदनातुरायै धीमहि तन्नः कामकलाकाली प्रचोदयात् ।

॥ अथ शक्त्यार्चनम् ॥

शक्ति को सुगंधित द्रव्यों से स्नान करायें –

ॐ ह्रीं क्लीं भगवति महामाये अनङ्गवेग साहसिनी सर्वजन मनोहारिणि सर्ववशंकरि मोदय मोदय प्रमोदय प्रमोदय एह्येहि आगच्छ आगच्छ कामकलाकालि सान्निध्यं कुरु कुरु हूं हूं फट् स्वाहा ।


वस्त्र अर्पण करें –

ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं स्त्रीं स्त्रीं त्रैलोक्यार्षिणि वस्त्रं गृहण गृहण फट् स्वाहा ।
कज्जल अर्पण करें –
ॐ हूं महाघोरतरे फेत्कारराविणि महामांसप्रिये हिलि हिलि मिलि मिलि कज्जलं गृहण गृहण ठः ठः ।

सिन्दूर अर्पण करें –

ॐ आं स्त्रीं क्लीं ह्रीं हूं श्रीं सर्वभूतपिशाच राक्षसान् ग्रस ग्रस मम जाड्यं छेदय छेदय स्फ्रों स्फ्रों स्फ्रों स्फ्रों हौं हौं मम शत्रून् दह दह उच्छादय उच्छादय स्तंभय स्तंभय विध्वंसय विध्वंसय सर्वग्रहेभ्यः शान्तिं कुरु कुरु रक्षा कुरु कुरु ऐं ऐं ऐं फट् ठः ठः ।

अमलक्तकार्पण मन्त्र –
क्लीं क्लीं नवकोटि योगिनी परिवृतायै हूं हूं कामकलाकाल्यै अनङ्गवेगमालाकुलायै ह्रीं ह्रीं इवयम्भूकुसुमप्रियायै रममलक्तं ह्रीं ह्रीं हौं हौं सुवासिन्यै निवेदयामि नमः स्वाहा ।

पूजागृहे मण्डल रचना कुर्यात् – गोमय से लेपन कर भूमि शुद्धि करें ।

आठों दिशाओं में अलग रंग के वृत्ताकार मण्डल बनायें । पूर्व में श्वेत, अग्निकोण में लाल, दक्षिण में कृष्ण, नैऋत्य में पीत वर्ण, पश्चिम में पाटल वर्ण, वायव्य में हरित, उत्तर में पिङ्ग, ईशान में धूमल वर्ण के वृत्त बनायें ।

चारों दिशाओं में ३-३ तथा चारों कोणों में २-२ एवं मध्य में एक वृत्त मण्डल बनायें । पश्चात भूपुर बनायें । इस तरह कुल २१ वृत्त बनाकर मध्य में त्रिकोण, षट्कोण या नवकोण से देवी यन्त्र बनायें ।

भूमि शोधन मन्त्र –

ॐ ओं ओं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं क्रों क्षं ग्लूं क्ष्ल्रौं क्लूं रच्रां, श्रीं सौः ज्रौं क्रैं ब्लूं ठ्रीं छ्रीं क्रीं क्लीं क्रौं पलक्रौं प्रीं ख्रौं क्लीं श्रीं क्रूं हक्लह्रवडकखऐं कसवहलमऔं व्रकम्लब्लक्लऊं क्ष्लह्रमव्य्रऊं लक्षमहजरक्रव्य्रऊं श्रीं म्रैं क्ष्रूं वीं ख्रैं ज्रं य्लैं एह्येहि भगवति कामकलाकालि सर्वशक्तिं समन्विते प्रसन्ना शक्तिभ्यां सामरस्यं कुरु कुरु मम पूजा गृहण गृहण शत्रून् हन हन मर्दय मर्दय पातय पातय राज्यं मे देहि देहि दापय दापय फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें फ्रें छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं छ्रीं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं फट् फट् नमः स्वाहाः ।

पीठ पर सिन्दूर से यन्त्र लेखन करें –

ॐ फ्रें हसखफ्रें छ्रीं फ्रों स्फ्रों ब्रीं द्रैं भ्रूं क्रों फट् फट् फट् फट् कामकलाकालि घोररावे विकटदंष्ट्रे कालि कपालि नररुधिरवसा मांस भोजनपप्रिये भगप्रिये भगाङ्कुशे भगमालिनी भगोन्मादिनि भगान्तरे इहागच्छ आगच्छ सन्निधिं कुरु कुरु ओं फ्रें सिद्धिकरालि ह्रीं छ्रीं हूं स्त्रीं फ्रें नमः स्वाहा
क्लीं क्रीं हूं क्रों स्क्रों कामकलाकालि स्फ्रों क्रों हूं क्रीं क्लीं स्वाहा
फ्रें खफ्रें हसखफ्रें हूं स्त्रीं छ्रीं ओं ओं ओं ओं ओं फट् नमः स्वाहा ।

सुन्दरी को मण्डल पर उपवेशन हेतु आवाहन करें –

हूं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं उपविश उपविश सुसन्निधिं कुरु कुरु स्वाहा ।

पश्चात् शक्ति के वस्त्र विमोचन करें –

ॐ हौं सफहलक्षूं फहलक्षीं हभ्रीं सौः खफ्रींरढ़्रीं प्रीं क्रैं जूं क्रौं हसखफ्रें सहक्लह्रीं क्रीं क्लूं क्षौं क्लीं श्रीं ह्रीं हसखफ्रें नमः स्वाहा ।

पश्चात् निर्वसना शक्ति को बिठाकर उसके अङ्क में योनि प्रदेश समीप तीर्थकलश स्थापित करें ।

एवं कुल परंपरानुसार पात्रा सादन कर अर्चन करें ।

ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः क्रों आं हूं स्फ्रों क्षूं क्रूं ह्रः क्रूं भ्रां स्हें ध्रीं ह्भ्रीं श्रीं जय जय भगवति कामकलाकालि सर्वेश्वरि इहागत्य चिरं तिष्ठ तिष्ठ यावत् पूजां करोम्यहम् फ्रें फ्रें फ्रें छ्रीं छ्रीं छ्रीं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं फट् फट् फट् स्वाहा ।

मातृमुख में कामाक्षाकाली व पितृमुख में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पूजन करें ।
एवं विपरीत रति से कामकला को प्रसन्न करें ।

॥ अथ शिवाबलि प्रयोगः ॥

शिवाबलि से साधक का सर्वतोमुखी कल्याण होता है । शिवाबलि श्मशान में या चतुष्पथ में या जहाँ शिवाओं आने की संभावना हो वहां दी जाती हैं । बलि के लिये चार प्रकार के अन्न प्रस्तुत करे ।

१. खीर (पायस)
२. अपूप (पुआ)
३. यावश ४.
मोदक युक्त शष्कुली ।
मस्त्य मांस के व्यञ्जन भी भिन्न भिन्न पात्रों में रखें ।

बलिद्रव्य ‘‘आसव” लेकर बलि स्थान पर जाये ।

श्मशान के वस्त्र का आसन ग्रहण कर उत्तराभिमुख होकर बैठे । देवीं श्री दक्षिणेकालि सृष्टि स्थित्यन्तकारिणि । अनुज्ञां देहि मे देवि करिष्येऽहं शिवाबलिम् ॥

से हाथ जोड़कर ‘‘उल्कामुखी” घोररूपा शिवा देवी का आवाहन करे । पश्चात् शिवा के आने की प्रतिक्षा करे । शिवा आ जावे तो पूजन पूर्वक ‘‘शिवारूपी काली” की स्तुति करे ।

शिवा आवाहन मन्त्र – १॰

” ॐ ऐं ह्रीं हूं हौं क्लीं लं आं ईं औं औं कामकलाकालि घोररावे महाकपालि विकटदंष्ट्रे संमोहिनि शोषणि करालवदने मदनोन्मादिनि ज्वालामालिनि शिवारूपिणि भगवति आगच्छ आगच्छ मम सिद्धि देहि देहि मां रक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं ह्रूं क्षां क्षीं क्षूं क्षौं हूं हूं फट् फट् स्वाहा ।

अथवा २॰

“ॐ ऐं ह्रीं हूं हौं क्लीं स्फ्रों ब्लां ब्लीं ब्लूं ब्लैं ब्लौं श्रीं कामकलाकालि घोररावे महाकपालि विकट दंष्ट्रे संमोहिनि शोषिणि करालवदने मदनोन्मादिनि ज्वालामालिनि शिवारूपिणि भगवति आगच्छ आगच्छ मम सिद्धिं देहि देहि मां रक्ष रक्ष ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं क्षां क्षीं क्षूं क्षौं हूं हूं फट् फट् स्वाहा ।

इस मन्त्र का ३ बार पठन करें। शिवारूप धरे देवि कालि कालि नमोस्तु ते ।
उल्कामुखी ललज्जिह्व घोररूपे शृगालिनि ॥ श्मशानवासिनि प्रेते शवमांसप्रियेऽनद्ये । अरण्यचारिणि शिवे फेरोजम्बुक रूपिणि ॥
नमोऽस्तु ते महामाये जगत् तारिणि कालिके । मातंगी कुक्कुटे रौद्रे कालि कालि नमोऽस्तु ते ॥

सर्वसिद्धि प्रदे देवि भयङ्करि भयापहे । प्रसन्ना भव देवेशि मम भक्तस्य कालिके ॥

संसारतारिणि जये जय सर्वशुभङ्करि । विस्रस्तचिकुरे चण्डे चामुण्डे मुण्डमालिनि ॥
संसारकारिणि जये सर्वसिद्धि प्रयच्छ मे । दुर्गे किराति शबरि प्रेतासनगते शिवे ॥

अनुग्रहं कुरु सदा कृपया मां विलोकय । राज्यं प्रदेहि विकटे वित्तमायुस्सुतान् स्त्रियम् ॥
शिवाबलि विधानेन प्रसन्ना भव शाङ्करि । नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु नमो नमः ॥
शिवारूप को धारण करने वाली कामकाली देवि उल्कामुखि, ललत् जिह्वावाली, घोरशब्द करने वाली शृगालिनि! तुमको नमस्कार है । श्मशानवासिनि प्रेते शवमांसप्रिये अनघे अरण्यचारिणि शिवे फेरो जम्बूकरूपिणि महामाये जगत्तारिणि कालिके! तुमको नमस्कार है । मातङ्गि कुक्कटे रौद्रि कालकालि! तुम्हें नमस्कार है । सर्वसिद्धिप्रदे भयङ्करि भयावहे देवेशि कालिके!
आप मेरे भक्त के ऊपर प्रसन्न हो जाओ । संसारतारिणि, जयशीले, सब प्रकार का शुभ करने वाली, खुले बिखरे केशों वाली, चण्डे, चामुण्डे, मुण्डमाला धारण करने वाली, संहारकारिणि, क्रुद्धे मुझे सर्वसिद्धि दो ।

हे दुर्गे, किराति, शबरि प्रेतासन पर आरूढ़, अभये मेरे ऊपर कृपा करो । कृपापूर्वक मुझे देखो । हे विकटे! मुझे राज्य धन आयु पुत्र और स्त्री दो । शिवाबलि के विधान से प्रसन्न हो जाओ । फेरुरूपिणी तुम्हें नमस्कार है बार-बार नमस्कार है । प्रकार शिव देवी की स्तुति कर साधक आसवपात्र से आसव बलिद्रव्यों पर गिराता हुआ मंत्र पढे।
ॐ ह्रीं शिवे सर्वदानन्दे सर्वकामार्थ सिद्धिदे इश्मां बलिं प्रदास्यामि कार्यसिद्धिप्रदा भव गृहण देवि महाभागे शिवे कालाग्निरूपिणि शुभाशुभफलं ब्रूहि गृहण गृहण बलिं तव॥

यदि शुभाशुभ फल न जानने की इच्छा हो तो अन्य मंत्र से बलि प्रदान करें ।
॥ शिवाबलि मन्त्र ॥

श्मशान या चोराहे पर जाकर तामसी या सात्विक बलि प्रदान करें । १॰

ॐ ह्रीं हूँ कामकलाकाल्यै महाघोरावायै भगमालिन्यै शिवारूपिण्यै ज्वालामालिन्यै इमं बलिं प्रयच्छामि गृहण गृहण खादय खादय मम सिद्धिं कुरु कुरु मम शत्रून् नाशय नाशय मारय मारय स्तंभय स्तंभय उच्चाटय उच्चाटय हन हन विध्वंसय विध्वंसय मथ मथ विद्रावय विद्रावय पच पच छिन्धि छिन्धि शोषय शोषय त्रासय त्रासय त्रुट त्रुट मोहय मोहय उन्मूलय उन्मूलय भस्मीकुरु भस्मीकुरु जृम्भय जृम्भय स्फोटय स्फोटय मथ मथ विद्रावय विद्रावय हर हर विक्षोभय विक्षोभय तुरु तुरु दम दम मर्दय मर्दय पालय पालय सर्वभूतभयङ्करि सर्वजन मनोहारिणि सर्वशत्रु क्षयङ्करि ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल शिवारूप धरे कालि कपालि महाकपालि ह्रीं ह्रीं ह्रं ह्रं ह्रैं हौं राज्यं मे देहि देहि किलि किलि चामुण्डे यमघण्टे हिलि हिलि ममसर्वाभीष्ट साधय साधय संहारिणि संमोहिनि कुरुकुल्ले किरि किरि हूं हूं फट् स्वाहा ।

२.
ॐ ह्रीं हूं कामकलाकाल्यै महाघोररावायै भगमालिन्यै शिवारूपिण्यै ज्वालामालिन्यै इमं बलि प्रयच्छामि गृहण गृहण खाद खाद मम सिद्धिं कुरु कुरु मम शत्रून् नाशय नाशय मारय मारय स्तंभय स्तंभय उच्चाटय उच्चाटय हन हन विध्वंसय विध्वंसय विद्रावय विद्रावय पच पच छिन्धि छिन्धि शोषय शोषय त्रासय त्रासय त्रुट त्रुट मोहय मोहय उन्मूलय उन्मूलय भस्मीकुरु भस्मीकुरु जृम्भय जृम्भय स्फोटय स्फोटय मथ मथ विद्रावय विद्रावय हर हर विक्षोभय विक्षोभय तुरु तुरु दम दम मर्दय मर्दय पातय पातय ह्रीं ॐ ।

३. सर्वभूतभयङ्करि सर्वजनमनोहारिणि सर्वशत्रुक्षयङ्करि ज्वल ज्वल प्रज्वल शिवारूपधरे कालि कपालि महाकपालि ह्रीं ह्रीं ह्रं ह्रं हौं हौं राज्यं मे देहि देहि किलि किलि चामुण्डे मम सर्वाभीष्टं साधय साधय संहारिणि संमोहिनि कुरुकुल्ले किरि किरि हूं हूं फट् फट् ॐ ।

इस मन्त्र को ३ बार पढकर मांसादि बलि देकर जल छोड़ें ।

शिवाबलिग्रहण करे तो अभीष्टसिद्धि प्राप्त होवे । बलिग्रहण न करे तो फलशून्य ।

गर्जना करे तो शुभ, रोदन करे तो अशुभ । दक्षिण में मुंहकर शब्द करे तो अशुभ, पूर्वोत्तरदिशा शुभ हैं ।

यदि पहले नैवेद्य ग्रहण करे तो अन्न से धन प्राप्ति, खीर खाये तो वाक्सिद्धि मिले, घी ग्रहण करे तो आयुवृद्धि, पुआ खाने से पुण्य, मोदक खाने से यश लाभ । मस्त्य खाये तो पत्नि लाभ ।

मांस खाये तो धन व विजय प्राप्त होती है ।                  मंत्र सिद्ध यँत्र माला दीक्षा हवन के लिए Contact        

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महाकाली नित्यास मंत्र साधना खडगमाला

महाकाली खडगमाला साधना
इस महाकाली खडगमाला साधना से पुत्र हीन को पुत्र, धनहीन को धन की प्राप्ति होती है। वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों का अधिकारी होकर दूसरों को वर प्रदान करने वाला बन जाता है। आकर्षण शक्ति बढ जाती है। क्रोध शांत हो जाता है। अध्यात्मिक शक्ति बढ जाती है। शत्रु उसका कुछ भी बिगाड नही पाते। समस्त अरिष्ट ग्रह, भूत पिशाच आदि का प्रभाव नही होता। कहने का तात्पर्य यह है कि महाकाली की कृपा से उसके समस्त कार्य केवल विचार मात्र से ही पूर्ण हो जाते हैं।

महाकाली खडगमाला साधना सामग्री यंत्र स्थापित करके  जाप करना चाहिए|

काली नित्यास
महाकाली का यंत्र स्थापना कर विधि पूर्वक पूजन जाप करना चाहिए|

ललिता की तरह , काली के भी पंद्रह नित्य या अनंत काल हैं, लेकिन ये बढ़ते चंद्रमा के बजाय घटते चंद्रमा से जुड़े हैं। ऊपर दिए गए यंत्र चित्र काली के जादू से लिए गए हैं और शक्तिसामंगन तंत्र के विवरण पर आधारित हैं ।

काली नित्य  और मंत्र सकारात्मक हैं।

कलि : क्षीण चन्द्रमा की प्रथम नित्य


यद्यपि उसका नाम वही है, फिर भी वह कालिका से पृथक है, एक अवर्णा या परिचारिका के रूप में।

ध्यान: श्याम वर्ण, अत्यंत डरावनी, भयंकर रूप से चीखने वाली, दुर्जेय, खोपड़ियों की माला पहने, पूर्ण रूप से फूले हुए स्तन, दाहिने हाथ में छुरी और बाएं हाथ से धमकी भरा इशारा करती हुई, श्मशान में।

मंत्र: ॐ ह्रीं काली काली महाकाली कौमारी मह्यं देहि स्वाहा।

कपालिनी: दूसरा नित्य



उसके नाम का अर्थ है खोपड़ी-लड़की। ध्यान: काले, नग्न, सुंदर चेहरा, बिखरे बाल, चार कटे हुए सिरों पर बैठी, एक छुरी, त्रिशूल दिखाती हुई, वरदान देती हुई और भय को दूर करती हुई।

मंत्र: ॐ ह्रीं क्रीं कपालिनी महाकपालप्रियेमनसे कपालसिद्धिं मे देहि हुं फट् स्वाहा।

सहायक: आंतरिक त्रिभुज में इच्छा, क्रिया और ज्ञान। मध्य त्रिभुज में रति, प्रीति, कांति। बाहरी त्रिभुज में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव, आठ मातृका देवियाँ। भूपुर में दिशाओं के संरक्षक।

कुल्ला: तीसरा नित्य

कुल्ला

ध्यान: चार भुजाओं वाली, तीन आंखों वाली, एक शव के दस कटे सिरों पर बैठी हुई, अपने दो बाएं हाथों में वरदान देने और भय दूर करने की मुद्रा दर्शाती हुई, अपने दाहिने हाथों में वह एक पुस्तक और एक माला धारण किए हुए हैं।

मंत्र: ॐ क्रीं कुल्लय नमः।

परिचारिकाएँ: प्रथम त्रिभुज में धृति, पुष्टि, मेधा। द्वितीय त्रिभुज में तुष्टि, प्रज्ञा, जया। आठ पंखुड़ियों में आठ मातृकाएँ और भैरव, चार द्वारों में लोकपाल (प्रधान और मध्यवर्ती दिशाओं के संरक्षक)।

कुरुकुल्ला: चौथा नित्य
कुरुकुल्ला

ध्यान: बड़े उठे हुए स्तन, सुन्दर नितम्ब, काले रंग की, शव पर बैठी हुई, बिखरे हुए बाल, खोपड़ियों की माला पहने हुए, कपाल, कैंची, छुरी और ढाल लिए हुए।

मंत्र: क्रीं ओम कुरुकुल्ले क्रीं ह्रीं मम सर्व-जन-वासमन्य क्रीं कुरुकुल्ले ह्रीं स्वाहा।

परिचारिकाएँ: आंतरिक त्रिभुज में काली, तारा, छिन्नमस्ता। मध्य में बलम्बा, रागला, रमा। बाहरी त्रिभुज में उग्र-गर्भा, उग्र-बीज, उग्र-वीर्य। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव और आठ मातृकाएँ हैं, और लोकपाल दिशाओं में हैं।

विरोधिनी: पांचवां नित्य
विरोधिनि

ध्यान: पूर्ण उठे हुए वक्ष, सर्पों और हड्डियों की माला पहने हुए, भयानक, तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाले, त्रिशूल, सर्प पाश, घंटी और डमरू धारण किए हुए। शव पर बैठे, पीले शरीर, बैंगनी वस्त्र।

मंत्र: ॐ क्रीं ह्रीं क्लीं हुं विरोधीनि शत्रुन्-उच्चतया विरोधी विरोधी शत्रु-क्षयकारी हुं फट।

सहायक: आंतरिक त्रिभुज में धूम्रचिरुष्मा, जावालिनी, विशफुलिंगिनी, मध्य में सुश्री, सुरूपा, कपिला। बाहरी में तीन शक्तियाँ हैं जिन्हें हव्यवाह, विरोधी-मस्तक, दशमी कहते हैं। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव और मातृकाएँ, भूपुर में लोकपाल।

विप्रचित्त: छठा नित्य
विप्रचित्त

ध्यान: उभरे हुए स्तन, चार भुजाएँ, तीन आँखें, नग्न, नीले कमल के समान रंग, बिखरे बाल, घूमती हुई जीभ, भय उत्पन्न करने वाली, हाथ में छुरी, कटा हुआ सिर, खोपड़ी की टोपी और त्रिशूल। वह अपने दाँत दिखाती है, उसके मुँह के कोने से खून बहता है।

मंत्र: ॐ श्रीं क्लीं चमुण्डे विपरीते दुष्टा-घातिनी शत्रुं-नाशय एतद्-दिन-वधि प्रिये सिद्धिम् मे देहि हुं फट् स्वाहा।

सहायक: बीजा के साथ बिन्दु, त्रिभुज में तीन गुण, षट्भुज में छह अंग, आठ पंखुड़ियों में मातृकाएं और भैरव, भूपुर में दिशाओं के रक्षक।

उग्र: सातवां नित्य
उगरा

ध्यान: नग्न, दुर्जेय, भयानक नुकीले दांतों के साथ, प्रत्यालीढ़ मुद्रा में पैर, खोपड़ियों की माला पहने हुए, बिखरे हुए बाल, काले, चार भुजाएं, एक तलवार, एक रात्रि कमल, एक खोपड़ी और एक चाकू पकड़े हुए, श्मशान भूमि में निवास करते हुए।

मंत्र: ॐ स्त्रीं हुं ह्रीं फट्।

परिचारिकाएँ: मध्य में हुं बीज, त्रिभुज में तारा, नील और एकजटा। आठ पंखुड़ियों में उग्र-घोप्र और शेष भैरव, बाहरी भाग में वैरोचन और शेष आठ मातृकाएँ, भूपुर में लोकपाल।

उग्रप्रभा: आठवां नित्य
उग्रप्रभा

ध्यान: चार भुजाएं, तीन आंखें, नीले कमल के समान रंग, शव पर बैठी, नग्न, बिखरे बाल, उभरे हुए स्तन, प्रसन्न मुख, सड़ा मांस खाती, शव के कटे हाथों की करधनी पहने, एक छुरी और एक सिर, एक खोपड़ी का कटोरा और एक चाकू पकड़े हुए।

मंत्र: ॐ हुं उग्रप्रभे देवि॰ काली महादेवी स्वरूपं दर्शय हुं फट् स्वाहा।

सहायक: प्रथम त्रिभुज में काली, तारा और रोचनी। बाहरी त्रिभुज में तारिणी-गण, तारामेकजटा और नील। आठ पंखुड़ियों में मातृकाएँ, पंखुड़ियों के शीर्ष पर आठ भैरव। भूपुर में लोकपाल।

दीपा नित्य: नौवां नित्य
ध्यान: चार भुजाएं, तीन नेत्र, बड़े नीलमणि के समान, खोपड़ियों की माला, नग्न, बिखरे बाल, भयानक नुकीले दांत, मानव हड्डी के बाजूबंद, खोपड़ियों के कंगन, बाएं हाथ में छुरी और सिर रखती हैं तथा दाहिने हाथ में भय दूर करने की मुद्राएं और देने की मुद्रा दर्शाती हैं।

मंत्र: ॐ क्रीं हुं दीप्तयै सर्व-मंत्र-फलादायै हुं फट् स्वाहा।

नीला: दसवां नित्य
नीला

ध्यान: चार भुजाएं, तीन नेत्र, नीले आभूषण के समान, खोपड़ियों का हार पहने हुए, शव पर बैठे, आंखें लाल और लुढ़कती हुई, उभरी हुई जीभ, मानव मांस और हड्डियों के आभूषण, सुंदर चेहरा, हिरण के समान आंखें।

मंत्र: हुं हुं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हसबलामारी नीलापताके हुं फट।

परिचारिकाएँ: त्रिभुज में कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि। षट्कोण में छह अंग। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव। कमल के आठ तंतुओं में आठ मातृकाएँ। भूपुर में वटुक नाथ आदि।

घाना, ग्यारहवाँ नित्य
घाना

ध्यान: चार भुजाएं, तीन आंखें, नग्नता में आनंदित, विकराल, डरावने दांत, सूजे हुए स्तन, काले, मुंह के कोनों से रक्त बहता है, वह मृत पुरुषों के हाथों की कमरबंद पहनती है, और एक तलवार, एक ढाल, एक त्रिशूल और एक गदा रखती है।

मंत्र: ॐ क्लीं ॐ घनालये घनालये ह्रीं हुं फट।

परिचारक: छह अंग छह कोणों में हैं, भैरव और मातृकाएं आठ पंखुड़ियों में हैं, और दिशाओं के रक्षक भूपुर में हैं।

बालक, बारहवें नित्य
ध्यान: चार भुजाएँ, तीन आँखें, मदिरा से मदहोश, खोपड़ियों की माला पहने, नग्न, विकराल, उभरे हुए स्तनों वाली, बाएँ हाथ में तलवार और सिर तथा दाएँ हाथ में खोपड़ी का कटोरा और धमकी देने वाली उँगली पकड़े हुए। खोपड़ियों के किले में बैठी हुई, वह दस लाख अग्नियों या सूर्यों के समान है।

मंत्र: ॐ क्रीं हुं ह्रीं बलाका काली अति अद्भुते पराक्रमे अभिस्ता सिद्धिं मे देहि हुं फट् स्वाहा।

मात्रा, तेरहवाँ नित्य
ध्यान: नीले-काले रंग का, नीले लेप से लिपटा हुआ, चार भुजाओं और तीन नेत्रों वाला, खोपड़ियों की माला पहने हुए, शव पर बैठा हुआ, भयंकर, खोपड़ी का कटोरा, कैंची, तलवार और कटा हुआ सिर लिए हुए। यह महान रौद्री भयंकर गर्जना करता है।

मंत्र: ॐ क्रीं हिम हुं ऐं १० महामात्रे सिद्धिं मे देहि सत्वरं हुं फट् स्वाहा।

मुद्रा, चौदहवाँ नित्य
मुद्रा

ध्यान: नग्न, नीले कमल के समान रंग, भयंकर, तीन भूरी आंखों वाली, चार भुजाएं, जोर से दहाड़ती हुई, मुंडों की माला, हाथों की करधनी, होठों पर रक्त, एक खोपड़ी का कटोरा और एक चाकू, एक तलवार और एक ढाल पकड़े हुए।

मंत्र: ॐ क्रीं हिम हुं प्रीं फ्रेम मुद्राम्ब मुद्रासिद्धिं मे देहिनी भो जगन्मुद्रास्वरूपिणी हुं फट् स्वाहा।

सहायक: त्रिभुज में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ हैं। राजयदा, भोगदा, मोक्षदा, जयदा, अभयदा, सिद्धिदा षटकोण में हैं। आठ मातृकाएँ आठ पंखुड़ियों में हैं, जिनके तंतुओं पर आठ भैरव हैं। भूपुर में गणप, योगिनियाँ, क्षेत्रपाल और वटुक नाथ हैं।

मीता, पंद्रहवीं नित्य
मिता

ध्यान: लाल वस्त्र, बिखरे बाल, उभरे हुए स्तन, सुन्दर नितम्ब, नग्नता में आनंद लेने वाली, भयानक, गहरे नीले रंग की, शव पर बैठी, खोपड़ियों की माला पहने, चार भुजाओं, तीन नेत्रों वाली, बाएं हाथ में तलवार और कटा हुआ सिर पकड़े, दाहिने हाथ से भय का नाश करने वाली तथा वरदान देने वाली। वह अंत समय में प्रलय की दस करोड़ अग्नियों के समान श्मशान में निवास करने वाली है।

मंत्र: ॐ क्रीं हुं ह्रीं ऐं मिते परमिते पराक्रमाय ॐ क्रीं हुं हिम ऐं सो-अहम हुं फट् स्वाहा।

परिचारिकाएँ: पहले त्रिभुज में काली, करालिनी, घोरा। दूसरे में वाम, ज्येष्ठा, रौद्रिका। तीसरे में इच्छा, ज्ञान, क्रिया। पहले भाग में वार्ताली, फिर लघुवराही, स्वप्नवराही, चौथे में तिरस्कारिणी। षटकोण में छह अंग, और आठ पंखुड़ियों में मातृकाएँ, तथा भूपुर में लोकपाल।                                                               मंत्र साधना विधि : मंत्र सिद्ध काली यँत्र स्थापना कर के मुंड माला से जाप करना चाहिए Contact

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कामकला काली साधना

KaamKala Mahakali

काम कला काली गुप्त साधना – गुप्त काली मंत्र

काम तंत्र साधना – ऊध्वमागे एवं कामख्या मार्ग
काम तंत्र साधना के विषय में तंत्र के इन मार्गों में कहा गया है कि सृष्टि की प्रथम उत्पत्ति योनि रूपा आद्या के रूप में होती है, जो अपने तीव्र घूणेन बल के कारण तत्व से घषॆण करते घोर आवेश से युक्त होती है. यह इसी कारण कामकला काली कहलाती है. प्रथम आद्या महाकाली इसे ही कहा जाता है .

गुप्त काली मंत्र – क्लीं क्री हूँ क्रों स्फ्रें कामकला काली स्फ्रें क्रों हूुँ  क्रीं क्लीं स्वाहा
ऋषि – महाकाल
आवाहन गुप्त मंत्र – ऊँ ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं स्वाहा .
बलिमंत्र – ऊँ ह्रीं क्रीं क्लीं क्लीं क्लीं बलि गृह गृह स्वाहा|

काम तंत्र साधना यंत्र – पहले एक विन्दु बनायें, फिर एक के उपर एक तीन त्रिकोण, फिर वृत, फिरअष्टदल, इसके बाद  चतुरस्त्र चार द्वार वाला भूपुर. त्रिकोण पर बाहर मायाबीज, क्रोधबीज, पाश  बाँयें कोण से. बीच में कामबीज. यंत्र के विषय में अधिक जानकारी के लिए हमसे संपर्क करें. यह मंत्र सिद्ध यंत्र  माला आप हमसे मंगवा भी सकते हैं|

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महाकाली साधना

काली मंत्र काली मंत्र: अर्थ, महत्व और लाभ देवी काली पृथ्वी की दिव्य रक्षक हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में कालिका के नाम से जाना जाता है। लेकिन देवी की विनाशकारी शक्ति के कारण उन्हें काली माता के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काली शब्द संस्कृत शब्द काल से आया है, जिसका अर्थ है समय। इसलिए देवी काली समय, परिवर्तन, शक्ति, सृजन, संरक्षण और विनाश का प्रतिनिधित्व करती हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि काली शब्द का अर्थ “काला” है। यह संस्कृत विशेषण काला की स्त्री संज्ञा है। आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, देवी काली को दुर्गा/पार्वती का उग्र रूप और भगवान शिव की पत्नी माना जाता है। काली मां ब्रह्मांड की बुरी शक्तियों का नाश करने वाली होने के साथ-साथ, जो उनकी श्रद्धाभाव से पूजा करता है, उनके अच्छे कर्म के लिए अच्छे फल भी प्रदान करती हैं।

अत: जो व्यक्ति मां काली की अत्यधिक भक्ति के साथ पूजा करते हैं, काली मां उनसे प्रसन्न होती हैं और उन पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखती हैं। साथ ही खूब आशीर्वाद भी देती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काली मां महान देवी की 10 महाविद्याओं या अभिव्यक्तियों में से पहली हैं। मां कली को आमतौर पर नृत्य करते हुए चित्रित किया जाता है या फिर वह अपने पति भगवान शिव के सीने पर एक पैर रखे खड़ी दिखाई जाती हैं। भगवान शिव अपनी पत्नी मां काली के पैर के नीचे शांत चित से लेटे नजर आते हैं। हमारे यहां काली मां की पूजा पूरे देश में की जाती है। नेपाल, श्रीलंका के साथ-साथ हमारे देश के कई हिस्सों में जैसे बंगाल, असम, कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, केरल और तमिलनाडु के कई भागों में यह पूजा की जाती है। देवी काली ने सदियों से धर्म की रक्षा की और पाप करने वाले को नष्ट करने के लिए कई रूप धारण किए हैं|

मां कालिका हिंदू धर्म में सबसे अधिक जागृत हैं और उन्होंने चार रूपों में पृथ्वी पर विचरण किया है – दक्षिणा काली, श्मशान काली, मां काली और महाकाली। इन सभी रूपों ने विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति की है, रक्षा वध से लेकर पृथ्वी और उसके मूल निवासियों के रक्षा करने तक।

मां काली के विनाशकारी रूप की कहानी

(Story behind the destructive form of Maa Kali in hindi)

दारुक नाम का एक कुख्यात असुर था, जिसने अपनी तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न किया था। मन चाहा वरदान प्राप्त करने के बाद वह देवताओं सहित ब्रह्मा को भी कष्ट देने लगा। इतना ही नहीं दारुक ने स्वर्ग में भी अपना राज्य स्थापित करना शुरू कर दिया। यह देख देवतागण ब्रह्मा और विष्णु के पास पहुंचे। तब देवतागणों को यह पता चला कि दारुक का वध कोई स्त्री ही कर सकती है। यह सुनकर देवताओं ने एक योजना बनाई। वे महिला रूप धारण कर दारुक से युद्ध करने पहुंचे। लेकिन वास्तव में स्त्री न होने के कारण उनको हार का मुंह देखना पड़ा। देवगण अपने आधिपत्य को खतरे में पाकर अपनी समस्या का निवारण पाने के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। देवताओं की याचना सुनने के बाद भगवान शिव ने मां पार्वती से बोले, “हे कल्याणी, मैं दुष्ट दारुक को नष्ट करने और दुनिया को बचाने के लिए आपसे निवेदन करता हूं। आप इस समस्या का समाधान निकालें।”

भगवान शिव का अनुरोध सुन माता पार्वती का एक अंश भगवान शिव में प्रवेश कर गया। भगवती माता का वह अंश भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर गया। विष पीने के कारण शिव का कंठ काला है। इसी कारण भगवती माता, देवी काली में परिवर्तित हो गईं। जब भगवान शिव ने खुद में मां काली को महसूस किया, तब उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोली। इसके बाद देवी काली प्रकट हुईं। वह अपने भयंकर रूप में थीं। शिव की तरह ही मां काली की भी माथे पर एक तीसरी आंख और एक चंद्र रेखा थी, कंठ पर विष का चिन्ह था और अपने हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए थीं। मां काली के प्रचंड रूप को देखकर देवता तक घबराकर भागने लगे। मां काली की केवल गुंजन से ही दारुक सहित समस्त असुर सेना जलकर राख हो गई। फिर भी काली की उग्रता समाप्त नहीं हुई। मां काली का क्रोध बढ़ता गया और उन्होंने समूची दुनिया को जलाना शुरू कर दिया।

संसार को क्रोध से बचाने के लिए शिव बालक का रूप धारण कर काली के सामने प्रकट हो गए। जब मां काली ने उस बालक शिरूपी को देखा तो वह उस रूप पर मोहित हो गईं। उन्होंने शिव के बाल रूप को अपने गले से लगाया और उसे अपना स्तनपान कराने लगीं। जल्द ही मां काली का क्रोध शांत हो गया। शिवजी द्वारा स्तनपान करने की वजह से कुछ ही क्षण में मां काली बेहोश हो गईं। मां काली को होश में लाने के लिए शिवजी तांडव करने लगे। जब मां काली होश में आईं, तो उन्होंने शिव को तांडव करते हुए देखा। शिव के साथ-साथ वह भी तांडव करने लगीं। उनके इसी रूप की वजह से उन्हें योगिनी भी कहा जाता है।

देवी काली के दो रूप (Two forms of Goddess Kali)

हिंदू धर्म में, देवी काली को मुख्य तौर पर दो रूपों में चित्रित किया गया है और उसी रूप को पूजा जाता है।

पहला चार भुजाओं वाला रूप है।

दूसरा, दस भुजाओं वाला रूप है, जिसे महा काली के नाम से भी जाना जाता है। इन दोनों रूपों में अलग-अलग अर्थ निहीत हैं। आइए इस संदर्भ में हम विस्तार से जानते हैं।

चार भुजाओं वाला रूप (Four-armed form) भारतीय कला चार भुजाओं वाली काली को काले या नीले रंग में चित्रित करती है। काली की आंखें लाल रंग की हैं, जो क्रोध को दर्शाती हैं। उनके बाल बिखरे हुए दिखाई देते हैं, छोटे-छोटे नुकीले दांत कभी-कभी उनके मुंह से बाहर निकल आते हैं और उनकी जीभ लटकी हुई होती है। मां काली के इंसान के कटे हाथों से बनी वस्त्र धारण करती हैं और गले में खोपड़ी की एक माला पहने होती हैं। मां काली का चतुर्भुज रूप शांत था, उसके चारों हाथों में अलग-अलग वस्तुएं हैं, क्रमश: एक में तलवार, एक में त्रिशूल (त्रिदंत), एक में कटा हुआ सिर और एक में एक में खून से भरी प्याली। जैसा कि अभी-अभी आपने पढ़ा कि मां के एक हाथ में तलवार और एक हाथ में मानव खोपड़ी है। यहां तलवार दिव्य ज्ञान का प्रतीक है और खोपड़ी मानव अहंकार का प्रतीक है, जिसे मोक्ष प्राप्त करने के लिए दिव्य ज्ञान द्वारा मारा जाना चाहिए। मां काली के दाहिने हाथ में अभय (निडरता) और वरदान (आशीर्वाद) मुद्राएं हैं, जिसका अर्थ है कि वह हमेशा अपने भक्तों को सही मार्गदर्शन करेंगी जिससे उनके भक्त भय, अहंकार आदि से बचे रहेंगे। मां काली अपने गले में खोपड़ी की माला धारण करती हैं, जिसकी गणना 108 या 51 में की जाती है, यही वजह है कि उन्हें ज्योतिष में सभी मंत्रों की मां के रूप में जाना जाता है।

दस भुजाओं वाला रूप (The ten-armed form) मां काली का दस भुजाओं वाला महाकाली का रूप है। अपने महाकाली रूप में उन्हें नीले पत्थर की तरह चमकते हुए दिखाया गया है। महाकाली दस भुजाओं वाले रूप में दस मुख, दस पैर और उनके प्रत्येक मुख पर तीन आंखें हैं। उनके प्रत्येक हाथ में विभिन्न वस्तु है, जो देवताओं की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इस शक्ति को महा काली के हथियारों के रूप में दर्शाया गया है। निहितार्थ यह है कि महाकाली उन शक्तियों के लिए जिम्मेदार हैं, जो इन देवताओं के पास हैं। इसका अर्थ यह है कि महाकाली ब्रह्म के समान हैं।

कभी-कभी लोग “एक मुखी” या दस भुजाओं वाली महाकाली की एक सिर वाली मूर्ति की पूजा करते हैं, जो उसी अवधारणा को दर्शाती है। काली के शक्ति उपकरण कुंडलिनी शक्ति (आध्यात्मिक शक्ति) है। इसमें क्रिया शक्ति मौजूद है, जो ब्रह्मांड को रचनात्मक रूप से प्रभावित करने की शक्ति है। इसके अलावा इच्छा शक्ति, जो व्यक्तिगत रूप से हमारे शारीरिक गति और कार्यों को करने के लिए बाध्य करती है। जबकि ब्रह्मांड में यह आकाशगंगाओं को एक दूसरे से ब्रह्मांडीय रात में ले जाने का कारण बनती है। विभिन्न मंत्रों के जाप से जातक को इन ऊर्जाओं को अपने लिए प्राप्त करने में मदद मिलती है।

काली मंत्र का जाप कैसे करें (How to chant the Kali mantras in hindi) महाकाली यंत्र माला लेकर ही मंत्र जाप शुरु करें|

देवी काली, काले रंग का प्रतिनिधित्व करती हैं और इसलिए अंधेरा उन्हें अपनी ओर आकर्षित करता है। काली मंत्र का जाप करने से पहले कुछ नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना चाहिए। जानिए कौन से हैं वे नियम- काली मंत्र (Kali mantras) का जाप सुबह के समय किया जा सकता है। लेकिन सूर्यास्त के कुछ घंटे बाद इन मंत्रों का जाप करना अधिक लाभकारी है।

काली मंत्र (Kali mantras) का जाप अमावस्या के दिन किया जाना ज्यादा लाभकारी होता है। मां काली मंत्र जाप या पूजा के दौरान लाल रंग के वस्त्र पहनें क्योंकि मां काली को यह रंग पसंद है। मां काली की मूर्ति या चित्र को लाल कपड़े के ऊपर रखकर मंत्र जाप करें। मंत्रों का जाप करते समय मां काली के लाल फूल, फल और मिठाई का भोग लगाएं। काली मंत्र का जाप करते समय हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं। इस मंत्र के नियमित जप से आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। मंत्र के उच्चारण से जो कंपन उत्पन्न होता है, वह आपको अपने अस्तित्व के शक्ति का अहसास कराता है। किसी भी काली मंत्र का जाप कम से कम 40 दिनों तक निरंतर करें। इससे आपको मनचाहा फल प्राप्त होगा। अगर आप काली मंत्र का जाप कर रहे हैं, तो मांसाहारी भोजन, प्याज और लहसुन से परहेज करें। महत्वपूर्ण काली मंत्र का मंत्र सिद्ध यंत्र माला लेकर ही करना चाहिए|

1. काली बीज मंत्र (Kali Beej Mantra) काली बीज मंत्र देवी काली से संबंधित है। जैसे बीज मंत्र का कोई विशिष्ट अर्थ नहीं है। लेकिन यह उन स्पंदनों का प्रतिनिधित्व करता है जो मन की आध्यात्मिक और मानसिक स्थिति को बेहतर बनाने में सहायता करते हैं। काली बीज मंत्र का जाप जातक को देवी काली की ऊर्जा से जोड़ता है। ये परिवर्तनकारी ऊर्जाएं जातक को उसके आसपास और अंदरूनी बुरी ताकतों से लड़ने में मदद करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि काली बीज मंत्र को भक्तिभाव से जप करने से जातक को मनपसंद चीजें प्राप्त होती हैं। वे चीजें भौतिक भी हो सकती हैं।

काली बीज मंत्र है:

|| ॐ क्रीं काली || अर्थ- यहां ‘क’ का अर्थ पूर्ण ज्ञान है, ‘र’ का अर्थ शुभ है और ‘बिंदु’ का अर्थ वह स्वंत्रता देती है। वह अपने भक्त को पूर्ण ज्ञान देती है और उसके जीवन को शुभ घटनाओं से भर देती है। उस सर्वोपरि देवी को मेरा नमन।

काली बीज मंत्र के जाप के लाभ (Benefits of chanting the Kali Beej mantra in hindi) ज्योतिषियों के अनुसार काली बीज मंत्र का जाप सभी बुरी शक्तियों से बचाता है। काली बीज मंत्र का भक्ति भाव के साथ जप करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और आपके आसपास के माहौल में सकारात्मकता का संचार होता है। जातक अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए भी इस मंत्र का जाप कर सकता है। काली बीज मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए हर रोज 108 बार काली बीज मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर

2. काली मंत्र (Kali Mantra) भले ही देवी काली भयावह दिखती हैं, लेकिन वह हमेशा अपने भक्तों की प्रार्थनाएं सुनती हैं। वह अपने भक्तों से बहुत प्यार करती हैं। यदि भक्त देवी काली से प्रार्थना करते समय काली मंत्र का जाप करते हैं, तो उनकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं। कहा जाता है कि नीचे वर्णित काली मंत्र जातक की चिंताओं को दूर करता है और भगवान के करीब लाने में मदद करता है। काली मंत्र सरल है और भक्त को जीवन में बेहतर निर्णय लेने में मदद करता है। इससे जातक की चेतना शुद्ध होती है। काली मंत्र है: || ॐ क्रीं कालिकायै नमः || अर्थ – काली मां के इस मंत्र का उपयोग काली माता के प्रतिनिधित्व के लिए किया जाता है। यह मंत्र काफी सरल है और इसके उच्चारण से चेतना शुद्ध होती है।

काली मंत्र जाप के लाभ (Benefits of chanting the Kali mantra in hindi) जैसा कि ऊपर बताया गया है, काली मंत्र भक्त की चेतना को शुद्ध करने में मदद करता है। इसका मायने यह है कि यह मंत्र जातक के मन से अव्यवस्था को दूर करने में मदद करता है। इस काली मंत्र के जाप से जातक को अत्यधिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह मंत्र सभी प्रकार के भावनात्मक दर्द को दूर करता है। यदि आपको अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में कठिनाई हो रही है, तो यह मंत्र आपके लिए बहुत उपयोगी है। यह मंत्र जातक को साहसी बनाता है। काली मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए हर रोज 108 बार काली मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर 3. महा काली मंत्र (Maha Kali mantra) महा काली का रूप डरावना है लेकिन वह अपने भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं। जो इस मंत्र का सही तरीके से और पूरे श्रद्धाभाव से उच्चारण करता है, उसमें साहस का संचार होता है। इससे भक्त को इस मंत्र के जाप की प्रेरणा भी मिलती है। महा काली महान दिव्य रूप हैं। इनके आशीर्वाद से जातक अपने आसपास की नकारात्म्क चीजों को बदलने की शक्ति प्राप्त करता है। यदि आप नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करते हैं, तो आप अपने चारों ओर सकारात्मक कंपन को महसूस करेंगे, जो आपको अपनी बेहतरी के लिए प्रेरित करेंगे।

महा काली मंत्र है: || ॐ श्री महा कलिकायै नमः || अर्थ – मैं दिव्य मां काली के समक्ष अपना सिर झुकाता हूं। देवी मां काली को मैं नमन करता हूं। महाकाली मंत्र के जाप के लाभ (Benefits of chanting the Maha Kali mantra in hindi) मां काली को प्रसन्न करने के लिए आपको महाकाली मंत्र का जाप करना चाहिए। महा काली मंत्र एक कवच है, जो जातकों को संकटों से उसकी रक्षा करता है। महा काली मंत्र का जाप करने से जीवन में स्थिरता आती है। साथ ही जातक को यह तय करने में मदद मिलती है कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत। महा काली मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए हर रोज 1008 बार महा काली मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर

4. कालिका-यी मंत्र (Kalika-Yei Mantra) हमारे जीवन में कुछ समस्याएं बहुत जटिल होती हैं। जटिल समस्याएं हमें बेहद परेशान करती हैं। ये परेशानियां हमें जीवन का आनंद लेने नहीं देतीं और न ही खुलकर जीने देती हैं। ऐसी परेशािनयों से निपटने के लिए कालिका-यी मंत्र है। यह मंत्र उन छात्रों और कामकाजी पेशेवरों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जिनकी जिंदगी संघर्षों से भरी हुई है, हर क्षण तनाव में रहते हैं, निजी या व्यवसायिक जीवन में खुद को असफल पाते हैं। यही नहीं अपने लिए बेहतर योजना बनाने में भी खुद को विफल पाते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए कालिका-यी मंत्र आपकी मदद कर सकता है। यह मंत्र बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान खोजने में मदद करता है।

कालिका-यी मंत्र है: || ॐ कलिं कालिका-य़ेइ नमः || अर्थ -देवी काली की जय हो। आप हमें अधिक सचेत और व्यावहारिक होने का आशीर्वाद दो। आप हमें बुद्धिमान बनाओ।

कालिका-यी मंत्र के जाप के लाभ (Benefits of chanting the Kalika-Yei mantra in hindi) जैसा कि ऊपर बताया गया है, कालिका-यी मंत्र को सभी प्रकार की समस्याओं से राहत दिलाने वाला माना जाता है, चाहे वह कितना भी जटिल क्यों न हो। यह मंत्र खासकर छात्रों और कामकाजी पेशेवरों के लिए उपयोगी है। इस मंत्र के उच्चारण जीवन बेहतर होता है। यह मंत्र जीवन की रक्षा करता है। यह आपको बुरी नजर से और उसके खतरों से बचाता है। इस प्रकार आप निरंतर प्रगति की ओर बढ़ सकते हैं। कालिका-यी मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए हर रोज 108 बार कालिका-यी मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर 5. काली गायत्री मंत्र (Kali Gayatri Mantra) यदि आप जीवन में शीघ्र सफल होना चाहते हैं तो काली गायत्री मंत्र सबसे उपयोगी मंत्रों में से एक है। अपने करियर में आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहे जातकों को काली गायत्री मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इस मंत्र के कंपन से जातक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा जातक को सफलता, सुख और समृद्धि प्रदान करता है।

काली गायत्री मंत्र है: || ॐ कालिकायै च विद्महे, श्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो काली प्रचोदयात् ||

अर्थ -ओ महान काली देवी, मां काली, जो जीवन के महासागर में और दुनिया को भंग करने वाले श्मशान घाट में निवास करने वाली, हम अपनी ऊर्जा आप पर केंद्रित करते हैं, आप हमें आशीर्वाद दो।’ काली गायत्री मंत्र के जाप के लाभ (Benefits of chanting the Kali Gayatri mantra in hindi) काली गायत्री मंत्र का जाप करते ही जातक का मन दैवीय रूप से रूपांतरित हो जाता है और मां काली के आशीर्वाद से उसकी सभी सांसारिक समस्याओं का निदान हो जाता है। काली गायत्री मंत्र जातक को उसके निजी कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा करने में मदद करता है। यह मंत्र जातक का भयमुक्त बनाता है या भय से निपटने के लिए उचित कदम उठाने में भी मदद करता है। काली गायत्री मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए प्रतिदिन 9 बार काली गायत्री मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर 6. दक्षिणा काली ध्यान मंत्र (Dakshina Kali Dhyan Mantra) ध्यान मन की एक अवस्था है, जो आपको परमात्मा से जुड़ने में मदद करती है। इस मंत्र को कर्पुरदी स्तोत्र भी कहा जाता है। ध्यान मंत्र के नियमित जाप से जातक मां काली की विभिन्न ऊर्जाओं से जुड़ सकता है। हालांकि, इस मंत्र का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए नियमित तौर पर दक्षिणा काली ध्यान मंत्र का जाप करना चाहिए।

दक्षिणा काली ध्यान मंत्र है: || ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं ||

अर्थ – धरती को पालने वाली और ब्रह्मांड को हर तरह के संकटों से बचाने वाली देवी मां को नमन।

दक्षिणा काली ध्यान मंत्र के जाप के लाभ (Benefits of chanting Dakshina Kali Dhyan mantra in hindi) इस मंत्र का जाप आपको ढोंग और सब तरह के बंधन जाल से मुक्त करता है। दक्षिणा काली ध्यान मंत्र आपको सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है, जिससे आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाते हैं और सभी कठिनाओं से मुक्ति पा लेते हैं। दक्षिणा काली ध्यान मंत्र के जाप से जातक को शांति, सुख और संतुष्टि मिलती है। दक्षिणा काली ध्यान मंत्र का जाप करने का सर्वोत्तम समय सूर्यास्त पश्चात इस मंत्र का जाप करने की संख्या 40 दिनों के लिए प्रतिदिन 9 बार दक्षिणा काली ध्यान मंत्र का जाप कौन कर सकता है? कोई भी किस ओर मुख करके इस मंत्र का जाप करें पूर्व या उत्तर दिशा

7. काली मंत्र (Kali Chants) उपरोक्त काली मंत्रों के अलावा कुछ अन्य काली मंत्र भी हैं, जिनका जाप देवी काली का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं।

ॐ काली, काली! ॐ काली, काली! नमोस्तुते, नमोस्तुते, नमो! नमोस्तुते, नमोस्तुते, नमो || आनंद मां आनंद मां काली आनंद मां आनंद मां काली आनंद मां आनंद मां काली ॐ काली माँ ||

काली मंत्र जाप के समग्र लाभ (Overall benefits of Chanting the Kali mantras in hindi)

काली मंत्र सबसे शक्तिशाली मंत्रों में से एक है। समस्याओं से बचने के लिए आप इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। काली मंत्र का जाप उन कंपन से गूंजता है, जो आपको शांत करते हैं अर्थात शांत मन प्राप्त करने के लिए इस मंत्र का उपयोग कर सकते हैं। काली मंत्र का जाप करने से व्यक्ति की आंतरिक चेतना जागृत होती है और जीवन में स्थिरता लाता है। काली मंत्र का जाप करने से आपको अपने परिवार और प्रियजनों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में मदद मिलती है। यदि आप नियमित रूप से भक्तिभाव के साथ काली मंत्र का जाप करते हैं, तो देवी आपके सभी कष्टों का अंत कर देंगी। नियमित रूप से मंत्र का जाप करने से जातक को उन आपदाओं से बचाता है, जो स्वास्थ्य, धन और सुख को प्रदान कर सकती हैं। काली मंत्र के नियमित जाप से आपको शक्ति मिलती है, जिससे आप अपने सामने आने वाली समस्याओं से सहजता से निपट सकते हैं। मां काली मंत्र का जाप आपके जीवन को उज्ज्वल करता है। यदि आप नियमित रूप से इन मंत्रों का जाप करते हैं तो आपको अपने आसपास सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होगा। यह मंत्र जातक की आर्थिक स्थिति सुधारता है और ऋणों से मुक्ति दिलाता है। काली मंत्र का जाप आपके प्रेम जीवन से जुड़ी समस्याओं को भी हल करने में मदद करता है। यह मंत्र सफलता, खुशी, प्रगति और कल्याण प्रदान करता है। मंत्र का जाप और इससे निकलने वाले कंपन आपके स्वास्थ्य को अच्छा करने में मदद करते हैं। काली मंत्र बुरी नजर से बचाता है और उन बाधाओं को दूर करता है, जो आपको सफल होने से रोकती हैं। इस मंत्र की मदद से आप अपने लिए सही साथी की तलाश कर सकते हैं। साथ ही काली मंत्र का जाप करने से विवाह में आई समस्याओं का समाधान खोजने में भी मदद मिलती है। काली मंत्र के जाप से जीवन में स्थिरता आती है। साथ ही ये मंत्र आपको सही निर्णय लेने में भी मदद करते हैं। आपके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है, आप यह समझने में भी सक्षम हो जाते हैं।

🌹काली माता के चमत्कारी मंत्र, दुर्गाजी का एक रुप कालीजी है। यह देवी विशेष रुप से शत्रुसंहार, विघ्ननिवारण, संकटनाश और सुरक्षा की अधीश्वरी है।महाकाली भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरुप, अनेक मन्त्र तथा अनेक उपासना विधियां है। यथा-श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, भद्रकाली, महाकाली आदि ।
दशमहाविद्यान्तर्गत भगवती दक्षिणा काली
(दक्षिणकालीका) की उपासना की जाती है।इनकी उपासना सुरक्षा, शौर्य, पराक्रम, युद्ध, विवाद और प्रभाव विस्तर के संदर्भ में की जाती है। कालीजी की रुपरेखा भयानक है। देखकर सहसा रोमांच होआता है। पर वह उनका दुष्टदलन रुप है।
काली के अनेक भेद हैं –
पुरश्चर्यार्णवेः-
१-दक्षिणाकाली
२॰ भद्रकाली
३॰श्मशानकाली
४॰ कामकलाकाली
५॰ गुह्यकाली
६॰ कामकलाकाली
७॰ धनकाली
८॰सिद्धिकाली
९॰ चण्डीकाली।

जयद्रथयामलेः-
१॰ डम्बरकाली
२॰ गह्नेश्वरी काली
३॰एकतारा
४॰ चण्डशाबरी
५॰ वज्रवती
६॰ रक्षाकाली
७॰ इन्दीवरीकाली
८॰धनदा
९॰ रमण्या
१०॰ ईशानकाली
११॰ मन्त्रमाता ।

सम्मोहने तंत्रेः-
‘१॰ स्पर्शकाली
२॰ चिन्तामणि
३॰ सिद्धकाली
४॰ विज्ञाराज्ञी
५॰ कामकला
६॰ हंसकाली
७॰ गुह्यकाली ।

तंत्रान्तरेऽपिः-
१॰ चिंतामणि काली
२॰ स्पर्शकाली
३॰ सन्तति-प्रदा-काली
४॰ दक्षिणा काली
६॰ कामकला काली
७॰ हंसकाली
८॰ गुह्यकाली ।

काली की गुप्त शक्ति
Maha kali shakti
1 – kerkasni ( kam krodh nasht)
2- shushakkanta (Heart atma  )
3- samaye trasani ( samaye dosh ko theek karti hai)
4-Guhevedni (purv janam ke dosh katati hai
काली की गुप्त शक्ति
Kerkesni
शुष्क कांता
समय त्रासनी
गुवेदनी                 दक्षिण कालिका के मन्त्र :-
भगवती दक्षिण कालिका के अनेक मन्त्र है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है।

श्मशान साधना मे काली उपासना
(1) क्रीं,
(2) ॐ ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं।
(3) ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
(4) नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।
(5) नमः आं क्रां आं क्रों फट स्वाहा कालि कालिके हूं।
(6) क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रींह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा।

इनमें से किसी भी मन्त्र का जप मंत्र सिद्ध यँत्र ले कर किया जा सकता है।

पूजा -विधि :-
दैनिक कृत्य स्नान-प्राणायम आदि से निवृत हो कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर, सामान्य पूजा-विधि से काली- यन्त्र का स्थपना कर के पूजन करें।

तत्पश्चात ॠष्यादि- न्यास एंव करागन्यास करके भगवती का इस प्रकार ध्यान करें-
शवारुढां महाभीमां घोरदृंष्ट्रां वरप्रदाम्।हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललजिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:। चतुर्बाहूयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥”
इसके उपरान्त मूल-मन्त्र द्वारा व्यापक-न्यास करके यथा विधि मुद्रा-प्रदर्शन पूर्वक पुनः ध्यान करना चाहिए।
पुरश्चरण : –
कालिका मन्त्र के पुरश्चरण में दो लाख की संख्या में मन्त्र-जप किया है।
कुछ मन्त्र केवल एक लाख की संख्या में भी जपे जाते है। जप का दशांश होमघृत द्वारा करना चाहिए ।

होम का दशांश तर्पण, तर्प्ण का दशांश अभिषेक तथाअभिषेक का दशांश ब्राह्मण – भोजन कराने का नियम है।
विधि –
लाल आसन पर कालीजी की प्रतिमा अथवा चित्र या यन्त्र स्थापित करके, लालचन्दन, पुष्प तथा धूपदीप से पूजा करके मन्त्र जप करना चाहिए। नियमत रुप से श्रद्धापूर्वक आराधना करने वालि जनों को कालीजी

(प्रायः सभी शक्ति स्वरुप) स्वप्न मे दर्शन देती है।
ऐसे दर्शन से घबङाना नहीं चाहिए और उस स्वप्न की कहीं चर्चा भी नही चाहिए। कालीजी की पुजा में बली का विधान भी है। किन्त सात्विक उपासना की दृष्टि से बलि के नाम पर नारियल अथवा किसी फल का प्रयोग किया जा सकता है।
ध्यान स्तुति-
खडगं गदेषु चाप परिघां शूलम भुशुंडी शिरः
शंखं संदधतीं करैस्तिनयनां सर्वाग भूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्य पाद द्शकां सेवै महाकालिकाम्।
यामस्तौत्स्वपितो हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम्॥
जप मन्त्र-
ॐ क्रां क्रीं क्रूं कालिकाय नमः।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै ससतं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै निततां प्रणतां स्मताम्॥

श्री महाकाली यन्त्र
श्मशान साधना मे काली उपासना का बङा महत्व है। इसी सन्दर्भ मे महाकालीयन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश, मोहन, मारण, उच्चाट्न आदि कार्यों मेंप्रयुक्त होता है। मध्य मे बिन्दू, पांच उल्ट कोण, तीन वृत कोण, अष्टदल वृतएवं भूरपुर से आवृत महाकाली का यन्त्र तैयार करे।
इस यन्त्र का पूजन करते समय शव पर आरुढ, मुण्ड्माला धारण की हुई, खड्ग, त्रिशूल, खप्पर व एक हाथ मे नर-मुण्ड धारण की हुई, रक्त जिह्वा लपलपाती हुईभयंकर स्वरुप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें विफलहो जाती है तब इस यन्त्र का सहारा लिया जाता है।चैत्र, आषाढ, आश्विन एवं माघ की अष्टमी इसकी साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है।
सिद्ध कुन्जिका स्तोत्र

श्री दुर्गा सप्तसती में वर्णित अत्यंत प्रभावशली इस सिद्ध कुन्जिका स्त्रोत्र का नित्य पाठ करने से संपूर्ण श्री दुर्गा सप्तशती पाठका फल मिलता है .यह महामंत्र देवताओं को भी दुर्लभ है , इस मंत्र का नित्यपाठ करने से माँ भगवती जगदम्बा की कृपा बनी रहती है ..
अथ सिद्ध कुन्जिका स्तोत्र
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः भवेत्॥1॥
न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥
कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥

अथ मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

॥ इति मंत्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिन ॥1॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥2॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥ 4॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिण ॥5॥
धां धीं धू धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥
हुं हु हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥ 8॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे॥
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥
। इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्|
महाकाली
त्रिलोक्य विजयस्थ कवचस्य शिव ऋषि ,
अनुष्टुप छन्दः, आद्य काली देवता,
माया बीजं,रमा कीलकम , काम्य सिद्धि विनियोगः || १ ||
ह्रीं आद्य मे शिरः पातु श्रीं काली वदन ममं,
हृदयं क्रीं परा शक्तिः पायात कंठं परात्परा ||२||
नेत्रौ पातु जगद्धात्री करनौ रक्षतु शंकरी,
घ्रान्नम पातु महा माया रसानां सर्व मंगला ||३||
दन्तान रक्षतु कौमारी कपोलो कमलालया,
औष्ठांधारौं शामा रक्षेत चिबुकं चारु हासिनि ||४|
ग्रीवां पायात क्लेशानी ककुत पातु कृपा मयी,
द्वौ बाहूबाहुदा रक्षेत करौ कैवल्य दायिनी ||५||
स्कन्धौ कपर्दिनी पातु पृष्ठं त्रिलोक्य तारिनी,
पार्श्वे पायादपर्न्ना मे कोटिम मे कम्त्थासना ||६||
नभौ पातु विशालाक्षी प्रजा स्थानं प्रभावती,
उरू रक्षतु कल्यांनी पादौ मे पातु पार्वती ||७||
जयदुर्गे-वतु प्राणान सर्वागम सर्व सिद्धिना,
रक्षा हीनां तू यत स्थानं वर्जितं कवचेन च ||८||
इति ते कथितं दिव्य त्रिलोक्य विजयाभिधम,
कवचम कालिका देव्या आद्यायाह परमादभुतम ||९||
पूजा काले पठेद यस्तु आद्याधिकृत मानसः,
सर्वान कामानवाप्नोती तस्याद्या सुप्रसीदती ||१०||
मंत्र सिद्धिर्वा-वेदाषु किकराह शुद्रसिद्धयः,
अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी प्राप्नुयाद धनं ||११|
विद्यार्थी लभते विद्याम कामो कामान्वाप्नुयात
सह्स्त्रावृति पाठेन वर्मन्नोस्य पुरस्क्रिया ||१२||
पुरुश्चरन्न सम्पन्नम यथोक्त फलदं भवेत्,
चंदनागरू कस्तूरी कुम्कुमै रक्त चंदनै ||१३||
भूर्जे विलिख्य गुटिका स्वर्नस्याम धार्येद यदि,
शिखायां दक्षिणे बाह़ो कंठे वा साधकः कटी ||१४||
तस्याद्या कालिका वश्या वांछितार्थ प्रयछती,
न कुत्रापि भायं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ||१५||
अरोगी चिर जीवी स्यात बलवान धारण शाम,
सर्वविद्यासु निपुण सर्व शास्त्रार्थ तत्त्व वित् ||१६||
वशे तस्य माहि पाला भोग मोक्षै कर स्थितो,
कलि कल्मष युक्तानां निःश्रेयस कर परम ||१७||
।। श्री श्री काली सहस्त्राक्षरी ।।
ॐ क्रीं क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीँ क्रीँ क्रीँ ह्रीँ ह्रीँ हूं हूं स्वाहा शुचिजाया महापिशाचिनी दुष्टचित्तनिवारिणी क्रीँ कामेश्वरी वीँ हं वाराहिके ह्रीँ महामाये खं खः क्रोघाघिपे श्रीमहालक्ष्यै सर्वहृदय रञ्जनी वाग्वादिनीविधे त्रिपुरे हंस्त्रिँ हसकहलह्रीँ हस्त्रैँ ॐ ह्रीँ क्लीँ मे स्वाहा ॐ ॐ ह्रीँ ईं स्वाहा दक्षिण कालिके क्रीँ हूं ह्रीँ स्वाहा खड्गमुण्डधरे कुरुकुल्ले तारे
ॐ. ह्रीँ नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन पच पच मथ मथ फ्रेँ विमोहिनी सर्वदुष्टान् मोहय मोहय हयग्रीवे सिँहवाहिनी सिँहस्थे अश्वारुढे अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून मां हिँसितुमुघतास्तान् ग्रस ग्रस महानीले वलाकिनी नीलपताके क्रेँ क्रीँ क्रेँ कामे संक्षोभिणी उच्छिष्टचाण्डालिके सर्वजगव्दशमानय वशमानय मातग्ङिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातग्ङिनी सर्वशंकरी नमः स्वाहा विस्फारिणी कपालधरे घोरे घोरनादिनी भूर शत्रून् विनाशिनी उन्मादिनी रोँ रोँ रोँ रीँ ह्रीँ श्रीँ हसौः सौँ वद वद क्लीँ क्लीँ क्लीँ क्रीँ क्रीँ क्रीँ कति कति स्वाहा काहि काहि कालिके शम्वरघातिनी कामेश्वरी कामिके ह्रं ह्रं क्रीँ स्वाहा हृदयाहये ॐ ह्रीँ क्रीँ मे स्वाहा ठः ठः ठः क्रीँ ह्रं ह्रीँ चामुण्डे हृदयजनाभि असूनवग्रस ग्रस दुष्टजनान् अमून शंखिनी क्षतजचर्चितस्तने
उन्नस्तने विष्टंभकारिणि विघाधिके श्मशानवासिनी कलय कलय विकलय विकलय कालग्राहिके सिँहे दक्षिणकालिके अनिरुद्दये ब्रूहि ब्रूहि जगच्चित्रिरे चमत्कारिणी हं कालिके करालिके घोरे कह कह तडागे तोये गहने कानने शत्रुपक्षे शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि अम्बिके तुभ्यं कल विकलायै बलप्रमथनायै योगमार्ग गच्छ गच्छ निदर्शिके देहिनि दर्शनं देहि देहि मर्दिनि महिषमर्दिन्यै स्वाहा रिपुन्दर्शने दर्शय दर्शय सिँहपूरप्रवेशिनि वीरकारिणि क्रीँ क्रीँ क्रीँ हूं हूं ह्रीँ ह्रीँ फट् स्वाहा शक्तिरुपायै रोँ वा गणपायै रोँ रोँ रोँ व्यामोहिनि यन्त्रनिकेमहाकायायै
प्रकटवदनायै लोलजिह्वायै मुण्डमालिनि महाकालरसिकायै नमो नमः ब्रम्हरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः शत्रुविग्रहकलहान् त्रिपुरभोगिन्यै विषज्वालामालिनी तन्त्रनिके मेधप्रभे शवावतंसे हंसिके कालि कपालिनि कुल्ले कुरुकुल्ले चैतन्यप्रभेप्रज्ञे
तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीँ ह्रीँ रक्ष रक्ष ज्वाला प्रचण्ड चण्डिकेयं शक्तिमार्तण्डभैरवि विप्रचित्तिके विरोधिनि आकर्णय आकर्णय पिशिते पिशितप्रिये नमो नमः खः खः खः मर्दय मर्दय शत्रून् ठः ठः ठः कालिकायै नमो नमः ब्राम्हयै नमो नमः माहेश्वर्यै नमो नमः कौमार्यै नमो नमः वैष्णव्यै नमो नमः वाराह्यै नमो नमः इन्द्राण्यै नमो नमः चामुण्डायै नमो नमः अपराजितायै नमो नमः नारसिँहिकायै नमो नमः कालि महाकालिके अनिरुध्दके सरस्वति फट् स्वाहा पाहि पाहि ललाटं भल्लाटनी अस्त्रीकले जीववहे वाचं रक्ष रक्ष परविधा क्षोभय क्षोभय आकृष्य आकृष्य कट कट महामोहिनिके चीरसिध्दके कृष्णरुपिणी अंजनसिद्धके स्तम्भिनि मोहिनि मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ।।
इस काली सहस्त्राक्षरी का नित्य पाठ करने से ऐश्वर्य,मोक्ष,सुख,समृद्धि,एवं शत्रुविजय प्राप्त होता है ।।
1-काली
दस महाविद्याओंमें काली प्रथम हैं। महाभागवतके अनुसार महाकाली ही मुख्य
हैं और उन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपोंमें अनेक रूप धारण करनेवाली दस
महाविद्याएं हैं। विद्यापति भगवान् शिवकी शक्तियाँ ये महाविद्याएँ हैं।
विद्यापति भगवान, शिव की शक्तियाँ ये महाविद्याएँ अनन्त सिद्धियाँ प्रदान
करने में समर्थ हैं। दार्शनिक दृष्टिसे भी कालतत्तवकी प्रधानता सर्वोपरि
है। इसलिये महाकाली या काली ही समस्त विद्याओं की आदि हैं। अर्थात् उनकी
विद्यामय विभूतियाँ ही महाविद्याएं हैं। ऐसा लगता है कि महाकालकी
प्रियतमा काली ही अपने दक्षिण और वाम रूपों में दस महा विद्याओं के नामसे
विख्यात हुईं। बृहन्नीलतन्त्रम ें कहा गया है कि रक्त और कृष्णभेदसे काली
ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं। कृष्णाका नाम ‘दक्षिणा’ और रक्तवर्णाका
नाम ‘सुन्दरी’ है।
कालिकापुराण में कथा आती है कि एक बार हिमालयपर अवस्थित मतंग मुनिके
आश्रम में जाकर देवताओं ने महामायाकी स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर
मतंग-वनिताके रूप में भगवतीने देवताओं को दर्शन दिया और पूछा कि तुमलोग
किसकी स्तुति कर रहे हो। उसी समय देवीके शरीर से काले पहाड़ के समान
वर्णवाली एक और दिव्य नारीका प्राकट्य हुआ। उस महातेजस्विनी ने स्वयं ही
देवताओं की ओर से उत्तर दिया कि ‘ये लोग मेरा ही स्तवन कर रहे हैं।’ वे
काजलके समान कृष्णा थीं, इसलिये उनका नाम ‘काली’ पड़ा।
दुर्गा सप्तशीतीके अनुसार एक बार शुम्भ-निशुम्भ के अत्याचार से व्यथित
होकर देवताओं ने हिमालय जाकर देवीसूक्त से देवीकी स्तुति की, तब गौरीकी
देहसे कौशिकीका प्राकट्य हुआ। कौशिकी के अलग होते ही अम्बा पार्वतीका
स्वरूप कृष्णा हो गया, जो ‘काली’ नाम से विख्यात हुईं। कालीको नीलरूपा
होने के कारण तारा भी कहते हैं। नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार कालीके
मन में आया कि वे पुनः गौरी हो जायँ। यह सोचकर वे अन्तर्धान हो गयीं।
शिवजीने नारदजी से उनका पता पूछा। नारदजी ने उनसे सुमेरुके उत्तर में
देवी के प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात कही। शिवजीकी प्रेरणासे नारद वहां
गये। उन्होंने देवीसे शिवजी के साथ विवाहका प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव सुनकर
देवी कुद्ध हो गयीं और उनकी देहसे एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट हुआ और
उससे छाया विग्रह त्रिपुरभैरवीका प्राकट्य हुआ।
काली की उपासना में सम्प्रदायगत भेद हैं। प्रायः दो रूपों में इनकी
उपासना का प्रचलन हैं। भव-बन्धन, मोचनमें उपासना सर्वोत्कृष्ट कही जाती
है। शक्ति –साधना के दो पीठों में कालीकी उपासना श्याम-पीठा पर करनेयोग्य
हैं। भक्तिमार्ग में तो किसी भी रूप में उन महामाया की उपासना फलप्रदा
है, पर सिद्धके लिये उनकी उपासना वीरभाव से की जाती है। साधना के द्वारा
जब अहंता, ममता और भेद-बुद्धिका नाश होकर साधन में पूर्ण शिशुत्व का उदय
हो जाता है, तब कालीका श्रीविग्रह साधकके समक्ष प्रकट हो जाता है। उस समय
भगवती कालीकी छवि अवर्णनीय होती है। कज्जलके पहाड़ के, समान, दिग्वसना,
मुक्तकुन्तला, शवपर आरुढ़, मुण्डमालाधारिणी भगवती कालीका प्रत्यक्ष दर्शन
साधकको कृतार्थ कर देता है। तान्त्रिक-मार्ग में यद्यपि कालीकी उपासना
दीक्षागस्य हैं, तथापि अनन्य शरणागति के द्वारा उनकी कृपा किसी को भी
प्राप्त हो सकती है। मूर्ति, मन्त्र अथवा गुरुद्वारा उपदिष्ट किसी भी
आधारपर भक्तिभावसे, मन्त्र-जप, पूजा, होम और पुरश्र्चरण करने से भगवती
काली प्रसन्न हो जाती हैं। उनकी प्रसन्नतासे साधकको सहज ही सम्पूर्ण
अभीष्टों की प्राप्ति हो जाती है।
भगवती कालिका अर्थात काली के अनेक स्वरुप, अनेक मन्त्र तथा अनेक उपासना विधियां है। यथा-श्यामा, दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली) गुह्म काली, भद्रकाली, महाकाली आदि । दशमहाविद्यान्तर्गत भगवती दक्षिणा काली (दक्षिण कालीका) की उपासना की जाती है।
दक्षिण कालिका के मन्त्र :- भगवती दक्षिण कालिका के अनेक मन्त्र है, जिसमें से कुछ इस प्रकार है।


(1) क्रीं,
(2) ॐ ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं।
(3) ह्रीं ह्रीं हुं हुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं हुं हुं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
(4) नमः ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा।
(5) नमः आं क्रां आं क्रों फट स्वाहा कालि कालिके हूं।
(6) क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हुं हुं स्वाहा। इनमें से कीसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है।
पूजा -विधि :- दैनिक कृत्य स्नान-प्राणायम आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर, सामान्य पूजा-विधि से काली- यन्त्र का पूजन करें। तत्पश्चात ॠष्यादि- न्यास एंव करागन्यास करके भगवती का इस प्रकार ध्यान करें-
शवारुढां महाभीमां घोरदृंष्ट्रां वरप्रदाम्।
हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललजिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:।
चतुर्बाहूयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥”
इसके उपरान्त मूल-मन्त्र द्वारा व्यापक-न्यास करके यथा विधि मुद्रा-प्रदर्शन पूर्वक पुनः ध्यान करना चाहिए।
पुरश्चरण : – कालिका मन्त्र के पुरश्चरण में दो लाख की संख्या में मन्त्र-जप किया है। कुछ मन्त्र केवल एक लाख की संख्या में भी जपे जाते है। जप का दशांश होम घृत द्वारा करना चाहिए । होम का दशांश तर्पण, तर्प्ण का दशांश अभिषेक तथा अभिषेक का दशांश ब्राह्मण – भोजन कराने का नियम है।
विशेष : -” दक्षिणा कालिका ” देवी के मन्त्र रात्रि के समय जप करने से शीघ्र सिद्धि प्रदान करते है। जप के पश्चात स्त्रोत, कवच, ह्रदय आदि उपलब्ध है, उनमें से चाहें जिनका पाठ करना चाहिए । वे सभी साधकों के लिए सिद्धिदायक है।
प्रथम महाविद्या काली
दस महाविद्या में काली का स्थान पहला है। उनके बारे में सबसे ज्यादा ग्रंथ लिखे गए हैं। उनमें से अधिकतर लुप्त हो चुके हैं। उनकी महिमा निराली है। क्रोध में भरी एवं दुष्टों के संहार में करने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाली माता भक्तों पर हमेशा कृपा बरसाती रहती हैं। वह अपने साधक भक्तों को समय-समय पर अपनी उपस्थिति का आभास भी कराती रहती हैं। विभिन्न ग्रंथों में इनके कई नाम और भेद हैं जो विशिष्ट ज्ञान के लिए ही जरूरी है। सामान्य तौर पर इनके दो रूप ही अधिक प्रचलित हैं। वे श्यामा काली (दक्षिण काली) और सिद्धिकाली (गुह्य काली) जिन्हें काली नाम से भी पुकारा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, वरुण, कुबेर, यम,, महाकाल, चंद्र, राम, रावण, यम, राजा बलि, बालि, वासव, विवस्वान सरीखों ने इनकी उपासना कर शक्तियां अर्जित की हैं। इनके रूपों की तरह मंत्र भी अनेक हैं लेकिन सामान्य साधकों को उलझन से बचाने के लिए उनका जिक्र न कर सीधे मूल मंत्रों पर आता हूं।
एकाक्षरी मंत्र– क्रीं
इसके ऋषि भैरव ऋषि, गायत्री छंद, दक्षिण काली देवी, कं बीज, ईं शक्तिः एवं रं कीलकं है। यह अत्यंत प्रभावी व कल्याणकारी मंत्र है। इसकी साधना से ही राजा विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हुई थी। शवरूढ़ां महाभीमां घोरद्रंष्ट्रां वरप्रदम् से ध्यान कर एक लाख जप कर दशांश हवन करें।
करन्यास व हृदयादि न्यास– ऊं क्रां, ऊं क्रीं, ऊं क्रूं, ऊं क्रैं, ऊं क्रौं, ऊं क्रं, ऊं क्र: से करन्यास व हृदयादि न्यास करें।
द्वयक्षर मंत्र– क्रीं क्रीं
ऋषि भैरव, छंद गायत्री, बीज क्रीं, शक्ति स्वाहा, कीलकं हूं है। बाकी पूर्वोक्त तरीके से करें।
काली पूजा प्रयोग
काली पूजा के सभी मंत्रों में 22 अक्षर वाले मंत्र को सबसे प्रभावी माना गया है। अन्य मंत्रों के प्रयोग में इसी मंत्र के अनुरूप पूजाविधान और यंत्रार्चन किया जाता है। इसका प्रयोग बेहद उग्र और आज की स्थिति में थोड़ी कठिन है। अतः मैं सामान्य जानकारी तो दूंगा पर साथ ही सलाह भी है कि सामान्य साधक इसके कठिन प्रयोग से बचें। यदि तीव्र इच्छा हो और उसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हों तो योग्य गुरु के निर्देशन में इसे करें।
बाइस अक्षर मंत्र–
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
विनियोग–
अस्य मंत्रस्य भैरव ऋषिः, उष्णिक् छंदः, दक्षिण कालिका देवता, ह्रीं बीजं, हूं शक्तिः, क्रीं कीलकं सर्वाभिष्ट सिद्धेयर्थे जपे विनियोगः।
अंगन्यास–
ऊं कुरुकुल्लायै नमः मुखे, ऊं विरोधिन्यै नमः दक्षिण नासिकायां, ऊं विप्रचित्तायै नमः वाम नासिकायां, ऊं उग्रायै नमः दक्षिण नेत्रे, ऊं उग्रप्रभायै नमः वाम नेत्रे, ऊं दीप्तायै नमः दक्षिण कर्णे, ऊं नीलायै नमः वाम कर्णे, ऊं घनायै नमः नाभौ, ऊं बालाकायै नमः हृदये, ऊं मात्रायै नमः ललाटे, ऊं मुद्रायै नमः दक्षिण स्कंधे, ऊं मीतायै नमः वाम स्कंधे। इसके बाद बूतशुदिध आदि कर्म करें। ह्रीं बीज से प्राणायाम करें।
ऋष्यादि न्यास–
भैरव ऋषिये नमः शिरसि, उष्णिक छंदसे नमः हृदि, दक्षिणकालिकायै नमः हृदये, ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये, हूं शक्तये नमः पादयोः, क्रीं कीलकाय नमः नाभौ। विनियोगाय नमः सर्वांगे।
षडंगन्यास–
ऊं क्रां हृदयाय नमः, ऊं क्रीं शिरसे स्वाहा, ऊं क्रूं शिखायै वषट्, ऊं क्रैं कवचाय हुं, ऊं क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ऊं क्रः अस्त्राय फट्।
ध्यान
चतुर्भुजां कृष्णवर्णां मुंडमाला विभूषिताम्,
खडग च दक्षिणो पाणौ विभ्रतीन्दीवर-द्वयम्।
द्यां लिखंती जटायैकां विभतीशिरसाद्वयीम्,
मुंडमाला धरां शीर्षे ग्रीवायामय चापराम्।।
वक्षसा नागहारं च विभ्रतीं रक्तलोचनां,
कृष्ण वस्त्रधरां कट्यां व्याघ्राजिन समन्विताम्।
वामपदं शव हृदि संस्थाप्य दक्षिण पदम्,
विलसद् सिंह पृष्ठे तु लेलिहानासव पिबम्।।
सट्टहासा महाघोरा रावै मुक्ता सुभीषणा।।
विधि एवं फल–
सूने घर, निर्जन स्थान, वन, मंदिर (काली को हो तो श्रेष्ठ), नदी के किनारे एवं श्मशान में इस मंत्र के जप से विशेष और शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। 22 अक्षर मंत्र का दो लाख जप कर कनेर के फूलों से दशांश हवन करना चाहिए। काली की नियमित उपासना करने का मतलब यही होत है कि साधक उच्चकोटि का है और उसने पहले ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गौरी, गणेश, सूर्य और कुछ महाविद्या की उपासना कर ली है और अब वह साधना के चरम की ओर अग्रसर हो रहा है।
कुछ कठिन प्रयोग–
जो साधक स्त्री की योनि को देखते हुए दस हजार जप करता है, वह ब़हस्पति के समान होकर लंबी आयु और काफी धन पाता है। बिखरे बालों के साथ नग्न होकर श्मशान में दस हजार जप करने से सभी कामनाएं सिद्ध होती हैं। हविष्यान्न का सेवन करता हुआ जप करे तो विद्या, लक्ष्मी एवं यंश को प्राप्त करेगा।
गुह्यकाली के कुछ मंत्र
1-नवाक्षर– क्रीं गुह्ये कालिका क्रीं स्वाहा।
2-चतुर्दशाक्षर मंत्र– क्रौं हूं ह्रीं गुह्ये कालिके हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
3-पंचदशाक्षर मंत्र– हूं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।
ध्यान
द्यायेन्नीलोत्पल श्यामामिन्द्र नील समुद्युतिम्। धनाधनतनु द्योतां स्निग्ध दूर्वादलद्युतिम्।।
ज्ञानरश्मिच्छटा- टोप ज्योति मंडल मध्यगाम्। दशवक्त्रां गुह्य कालीं सप्त विंशति लोचनाम्।
मंत्र सिद्ध यन्त्र माला सिद्धि हवन के लिए contact करें।

भद्रकाली मंत्र साधना

देवी भद्रकाली का पूजन मंत्र साधना

वामन व ब्रह्म पुराण में कुरुक्षेत्र स्थित चार कूपों का वर्णन है। जिसमें चंद्रकूप, विष्णुकूप, रुद्रकूप व देवीकूप हैं। यही देवीकूप मां भद्रकाली की शक्तिपीठ है। शिव पुराण के अनुसार देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ पर सती के दाएं घुटने से नीचे का भाग गिरा था।

तक्षेश्वर शिव लिंग

महाभारत युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण की आज्ञा से अर्जुन ने भद्रकाली की पूजन कर उनसे विजय का वर मांगा था। जीत के बाद पांडवों ने देवी पर श्रेष्ठ घोड़े अर्पित किए थे। यहां श्रद्धालु वाद विवाद में जीत की कामना पूरी होने पर मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं। यहीं देवी तालाब के किनारे भद्रकाली शक्तिपीठ का तक्षेश्वर लिंग है।

यहां बलराम व कृष्ण का मुंडन संस्कार हुआ था। मान्यतानुसार रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक श्रद्धालु सुरक्षा के लिए देवी पर रक्षासूत्र बांधते हैं। देवी भद्रकाली के विधिवत पूजन व उपाय से कोर्ट केस में जीत मिलती है, शारीरिक सुरक्षा मिलती है व सुंदरता में वृद्धि होती है।

स्पेशल पूजन विधि: घर की दक्षिण दिशा में लाल कपड़े पर देवी भद्रकाली चित्र काली यंत्र स्थापित कर विधिवत षोडशोपचार पूजन करें। चमेली के तेल का दीपक करें, गुग्गल से धूप करें, सिंदूर चढ़ाएं, देवी पर कुमकुम मौली मसूर, रक्षा, इत्र, कर्पूर व गेहूं अर्पित करें तथा गुड का भोग लगाएं। तथा रुद्राक्ष की माला से इस स्पेशल मंत्र का जाप करें। पूजा के बाद भोग किसी गाय को खिला दें।

स्पेशल मंत्र:

ॐ हौं भद्रकाली महाकाली किलिकिलि फट् स्वाहा॥

स्पेशल मुहूर्त: । उपाय: गुड हैल्थ के लिए: देवी भद्रकाली पर चढ़े सिंदूर से मस्तक पर तिलक करें। गुडलक के लिए: देवी भद्रकाली पर 1 अमरूद व 1 केला चढ़ाएं। विवाद टालने के लिए: बरगद के 2 पत्तों पर सिंदूर लगाकर देवी भद्रकाली पर चढ़ाएं। नुकसान से बचने के लिए: देवी भद्रकाली पर लाल फूलों की पत्तियां चढ़ाएं। प्रॉफेश्नल सक्सेस के लिए: देवी भद्रकाली पर लाल चंदन चढ़ाकर कलाई पर टीका करें। एजुकेशन में सक्सेस के लिए: “ऐं क्रीं क्रीं कालिकायै स्वाहा” मंत्र का जाप करें बिज़नेस में सफलता के लिए: देवी भद्रकाली पर चढ़े गेहूं के दाने गल्ले में रखें। पारिवारिक खुशहाली के लिए: पूजाघर में कर्पूर से गुग्गल जलाकर धूप करें। लव मे सक्सेस के लिए: भोजपत्र पर सिंदूर से लवर का नाम लिखकर देवी भद्रकाली पर चढ़ाएं। मैरिड लाइफ में सक्सेस के लिए: दंपत्ति देवी भद्रकाली पर शहद चढ़ाएं। स्पेशल टोटके कोर्ट केस में जीत के लिए: देवी भद्रकाली पर साबुत उड़द चढ़ाकर किसी गमले को बो दें। शारीरिक सुरक्षा के लिए: देवी भद्रकाली पर मौली चढ़ाकर अपने दाहिने हाथ की कलाई पर बांधें। सुंदरता में वृद्धि के लिए: देवी भद्रकाली लाल चंदन पर चढ़ाकर उसे फेस पैक की तरह इस्तेमाल करें।

काली महाकाली video

महाकाली सनातन हिन्दू शिव शिव धर्म की देवी जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की प्रमुख शक्ति हैं।

यह सुन्दरी रूप वाली भगवती दुर्गा का काला और शक्तिशाली रूप है, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों असुरों को नष्ट करने, दुष्ट प्रवृतियों को नाश कऱ भक्तों के अन्दर ऊर्जा उत्पन्न करती ही है ,परन्तु सभी प्राणीयों में कर्मानुसार फल भी प्रदान करती है ।

वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रक्षा ओर देखभाल करती है।

काली की व्युत्पत्ति काल अथवा समय से हुई है जो सबको अपना ग्रास बना लेता है। माँ का यह रूप है जो नाश करने वाला है पर यह रूप सिर्फ उनके लिए हैं जो दानवीय प्रकृति के हैं जिनमे कोई दयाभाव नहीं है। यह रूप बुराई से अच्छाई को जीत दिलवाने वाला है अत: माँ काली अच्छे मनुष्यों की शुभेच्छु है और पूजनीय है। इनको महाकाली भी कहते हैं।

काली

संबंध
महाविद्या, देवी
निवासस्थान
शमशान
अस्त्र
खप्पर मुण्ड = मुण्डमाला
जीवनसाथी
शिव जी
सवारी
शव
भगवती काली दसमहाविद्याओं में प्रथम स्थान पर हैं। काली देवी को आद्य महाविद्या भी कहा गया है। भगवती काली का रूप अत्यंत भयंकर है, परन्तु ये देवी अपने भक्तों के हर इच्छाओं को पूर्ण करने वाली, दयामयी हैं। तंत्र ग्रंथों में भगवती महाकाली के अनेको रूपों का वर्णन किया गया है एवं अनेकों साधना विधान बताये गए हैं, परन्तु तंत्र का अनुसरण और तांत्रिक साधनाएँ अत्यंत दुरूह भी हैं।

माँ महाकाली में अनन्य भक्ति एवं अटूट विश्वास रखकर कोई भी मनुष्य उनकी कृपा प्राप्त कर सकता है।

काली देवी की साधना हर प्रकार के मनोकामनाओं की पूर्ति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए की जाती है।

चामुंडा

शुम्भ और निशुम्भ के सेनापति चंड और मुंड का वध करने के कारण देवी काली का एक नाम चामुण्डा देवी भी है , जो कुंडलिनी जागरण ओर मूलाधार चक्र में बहुत ही मजबूत आधार बनाने में सहायक होती है.

रणचंडी

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार शुम्भ और निशुम्भ दो भाई थे जो महर्षि कश्यप और दनु के पुत्र तथा नमुचि के भाई थे।

देवीमहात्म्य में इनकी कथा वर्णित है।

इंद्र ने एक बार नमुचि को मार डाला। रुष्ट होकर शुंभ-निशुंभ ने उनसे इंद्रासन छीन लिया और शासन करने लगे। इसी बीच दुर्गा ने महिषासुर को मारा और ये दोनों उनसे प्रतिशोध लेने को उद्यत हुए। इन्होंने दुर्गा के सामने शर्त रखी कि वे या तो इनमें किसी एक से विवाह करें या मरने को तैयार हो जाऐं। दुर्गा ने कहा कि युद्ध में मुझे जो भी परास्त कर देगा, उसी से मैं विवाह कर लूँगी। इस पर दोनों से युद्ध हुआ और दोनों मारे गए।

Mahakali video
Mahakali

महाकाली के रुप व वीडियो

महाकाली

काली की गुप्त शक्ति
Maha kali shakti
1 – kerkasni ( kam krodh nasht)
2- shushakkanta (Heart atma  )
3- samaye trasani ( samaye dosh ko theek karti hai)
4-Guhevedni (purv janam ke dosh katati hai
काली की गुप्त शक्ति
Kerkesni
शुष्क कांता
समय त्रासनी
गुवेदनी

Mahakali video

महाकाली मंत्र साधना

महाकाली मंत्र

काली Maha Kali Tantra मंत्र
काली मां दुर्गा का ही एक स्वरुप है। मां दुर्गा के इस महाकाली स्वरुप को देवी के सभी रुपों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है। दसमहाविद्याओं में काली का पहला स्थान माना जाता है। दुष्ट, अभिमानी राक्षसों के संहार के Oलिए मां काली को जाना जाता है। अक्सर काली की साधना सन्यासी या तांत्रिक करते ही करते हैं लेकिन मां काली के कुछ मंत्र ऐसे भी हैं जिनका जाप कर कोई भी साधक अपने जीवन के संकटों को दूर कर सकता है।

सर्वप्रथम मंत्र सिद्ध महाकाली साधना सामग्री प्राप्त कर लें.

महाविद्या महाकाली साधना आप नवरात्रि के दिनों में भी कर सकते हैं ओर किसी शुभ मुहूर्त में भी कर सकते हैं ! महाविद्या महाकाली साधना रात में 9 बजे या उसके बाद की जाने वाली साधना हैं !

महाविद्या महाकाली साधना करने वाले साधक को स्नान करके शुद्ध काले वस्त्र धारण करके किसी काली मंदिर या अपने घर में किसी एकान्त स्थान या पूजा कक्ष में दक्षिण दिशा की तरफ़ मुख करके काले आसन पर बैठ जाए ! उसके बाद अपने सामने चौकी रखकर उस पर काला रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर प्लेट स्थापित कर उस प्लेट में रोली या काजल से त्रिकोण बनाये उस पर मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठा युक्त “महाकाली यंत्र ” को स्थापित करें ! महाकाली यंत्र के सामने शुद्ध सरसों के तेल का दीपक जलाये और मन्त्र विधान अनुसार संकल्प आदि कर सीधे हाथ में जल लेकर विनियोग करे :

ॐ अस्य श्री दक्षिण कालिका मन्त्रस्य भैरव ऋषि रुष्णि दक्षिण कालिका देवता ह्रीं बीजं हूं शक्ति: क्रीं कीलकं ममा भीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोग:।ऋष्यादि न्यास : बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुए अपने भिन्न भिन्न अंगों को स्पर्श करते हुए ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र होते जा रहे हैं ! ऐसा करने से आपके अंग शक्तिशाली बनेंगे और आपमें चेतना प्राप्त होती है ! मंत्र :

भैरवऋषये नम: शिरसि ( सर को स्पर्श करें )

उष्णिक् छन्दसे नम: मुखे ( मुख को स्पर्श करें )

दक्षिणकालिकादेवतायै नम: ह्रदये ( ह्रदय को स्पर्श करें )

ह्रीं बीजाय नमो गुहे ( गुप्तांग को स्पर्श करें )

हूं शक्तये नम: पादयोः ( पैरों को स्पर्श करें )

क्रीं कीलकाय नम: नाभौ ( नाभि को स्पर्श करें )

विनियोगाय नम: सर्वांगे ( पूरे शरीर को स्पर्श करें )

कर न्यास :

अपने दोनों हाथों के अंगूठे से अपने हाथ की विभिन्न उंगलियों को स्पर्श करें, ऐसा करने से उंगलियों में चेतना प्राप्त होती है ।ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नम: ।

ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नम: ।

ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नम: ।

ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नम: ।

ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नम: ।

ॐ क्र: करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: ।

ह्रदयादि न्यास :

पुन: बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की समूहबद्ध, पांचों उंगलियों से नीचे दिए गये निम्न मंत्रों के साथ शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श करते हुए ऐसी भावना मन में रखें कि वे सभी अंग तेजस्वी और पवित्र होते जा रहे हैं ! ऐसा करने से आपके अंग शक्तिशाली बनेंगे और आपमें चेतना प्राप्त होती है !

मंत्र :

ॐ क्रां ह्रदयाय नम: ( ह्रदय को स्पर्श करें )

ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ( सिर को स्पर्श करें )

ॐ क्रूँ शिखायै वषट् ( शिखा को स्पर्श करें )

ॐ क्रैं कवचाय हुम् ( दोनों कंधों को स्पर्श करें )

ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट ( दोनों नेत्रों को स्पर्श करें )

ॐ क्र: अस्त्राय फट् ( सिर के ऊपर से ऊँगली घुमाकर चारों दिशाओं में चुटकी बजाएं )

ध्यान :

इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर माँ भगवती महाकाली का ध्यान करके पूजन करें ! और धुप, दीप, चावल, पुष्प से महाविद्या महाकाली मन्त्र का जाप करें !

शवारुढ़ाम्महा भीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम् ।

चतुर्भुजां खड्ग मुण्डवरा भयकरां शिवाम् ।।

मुण्ड मालाधरान्देवी लोलजिह्वान्दिगम्बरां ।

एवं संचिन्तयेत्काली शमशानालयवासिनीम्।।

ऊपर दिया गया पूजन सम्पन्न करके सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित “रुद्राक्ष माला” की माला से नीचे दिए गये मंत्र की 23 माला 11 दिनों तक जप करें ! और मंत्र उच्चारण करने के बाद काली कवच का पाठ करें !

22 अक्षरी

श्री दक्षिण काली मंत्र

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूँ हूँ ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥

इस मंत्र के जरिये दक्षिण काली का आह्वान किया जाता है। शत्रुओं के विनाश के लिए साधक इस मंत्र के जरिये मां काली की साधना करते हैं व सिद्धि प्राप्त करते हैं। तंत्र विद्या में मां काली की साधना के लिए यह मंत्र काफी लोकप्रिय है। इस मंत्र का तात्पर्य है अर्थ है कि परमेश्वरी स्वरुप जगत जननी महाकाली महामाया मां मेरे दुखों को दूर करें। शत्रुओं का नाश कर मां अज्ञानता का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश हो। वैसे भी मां काली ज्ञान, मोक्ष तथा शत्रु नाश करने की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी कृपा से समस्त दुर्भाग्य दूर हो जाते हैं

एकाक्षरी काली मंत्र

ॐ क्रीं

यह मां काली का एकाक्षरी मंत्र है। इसका जप मां के सभी रूपों की आराधना, उपासना और साधना में किया जा सकता है। मां काली के इस एकाक्षरी मंत्र को मां चिंतामणि काली का विशेष मंत्र भी कहा जाता है।तीन अक्षरी काली मंत्र

ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं॥

मां काली की साधना व उनके प्रचंड रुपों की आराधना के लिए यह तीन अक्षरी मंत्र एक विशिष्ट मंत्र है। एकाक्षरी व त्रयाक्षरी मंत्रों को तांत्रिक साधना के मंत्र के पहले और बाद में संपुट की तरह भी लगाया जा सकता है।

पांच अक्षरी काली मंत्र

ॐ क्रीं ह्रुं ह्रीं हूँ फट्॥

माना जाता है कि इस पंचाक्षरी मंत्र का जाप प्रतिदिन प्रात:काल में 108 बार किया जाये तो मां काली साधक के सभी दुखों का निवारण करके उसके यहां धन-धान्य की वृद्धि करती हैं। पारिवारिक शांति के लिए भी इस मंत्र का जप किया जाता है।

षडाक्षरी काली मंत्र

ॐ क्रीं कालिके स्वाहा॥

इस षडाक्षरी मंत्र का जप सम्मोहन आदि तांत्रिक सिद्धियों के लिए किया जाता है। यह मंत्र तीनों लोकों को मोहित करने वाला है।

सप्ताक्षरी काली मंत्र

ॐ हूँ ह्रीं हूँ फट् स्वाहा॥

यह मंत्र भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए यह मंत्र कारगर माना जाता है।

श्री दक्षिणकाली मंत्र

ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणकालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं॥

तांत्रिक इस मंत्र के जरिये दक्षिण काली की साधना कर सिद्धि प्राप्ति की कामना करते हैं। यदि आपको शत्रुओं का भय सता रहा है तो आप भी अपने गुरु के मार्गदर्शन में इस मंत्र का जाप कर सकते हैं।

श्री दक्षिणकाली मंत्र

क्रीं ह्रुं ह्रीं दक्षिणेकालिके क्रीं ह्रुं ह्रीं स्वाहा॥

यह भी दक्षिण काली का एक प्रचलित मंत्र है। रोग दोष आदि को दूर करने के लिए इस मंत्र से साश्री दक्षिणकाली मंत्र

ॐ ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके ह्रुं ह्रुं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं स्वाहा॥

इस मंत्र में भी विभिन्न बीज मंत्रों को सम्मिलित किया गया है जिससे मंत्र और अधिक शक्तिशाली हो जाता है। मां काली को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक या सन्यासी इस मंत्र के द्वारा मां काली की साधना करते हैं।

श्री दक्षिणकाली मंत्र

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रुं ह्रुं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिके स्वाहा॥

यह काली माता का एक विशिष्ट मंत्र है इसका प्रयोग भी तांत्रिक साधना में किया जाता है।

भद्रकाली मंत्र

ॐ ह्रौं काली महाकाली किलिकिले फट् स्वाहा॥

मां भद्रकाली के इस मंत्र का प्रयोग शत्रुओं को वश में करने के लिये किया जाता है। शत्रुओं के तीव्र विनाश के लिये मां भद्रकाली की साधना की जाती है। मां भद्रकाली को धर्म, कर्म और अर्थ की सिद्धी देने वाली माना जाता है। साधक जिस भी कामना से भद्रकाली की साधना करता है, उनकी उपासना करता है, वह पूर्ण होती है।

श्री शमशान काली मंत्र

ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं॥

यह माना जाता है कि शमशान काली शमशान में वास करती हैं व शव की सवारी करती हैं। तंत्र विद्या के अनुसार शमशान काली की साधना शवारुढ़ यानि शव पर बैठकर की जाती है। इसलिए यह बहुत ही जटिल एवं अमानवीय साधना भी मानी जाती है जो कि सामाजिक व कानूनी रुप से लगभग प्रतिबंधित है। फिर भी लकड़ी आदि के टुकड़ों में प्राण प्रतिष्ठा कर उसे शव का रुप देकर भी तांत्रिक शमशान काली की साधना करते हैं। भूत-प्रेत, पिशाचादि को वश में करने के लिए शमशान काली की साधना की जाती है।

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा।

शत्रु और मुक़दमे की समस्या से ऐसे पाएं मां काली की कृपा से मुक्ती-

– लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन पर बैठें.

– मां काली के समक्ष दीपक और गुग्गल की धूप जलाएं.

– मां को प्रसाद में पेड़े और लौंग अर्पित करें.

– इसके बाद “ॐ क्रीं कालिकायै नमः” का 13 माला जाप करें.

– शत्रु और मुक़दमे से मुक्ति की प्रार्थना करें.

– मंत्र जाप के बाद 10 मिनट तक जल का स्पर्श न करें.

– ये प्रयोग लगातार 27 रातों तक करें.

माता काली के समक्ष जलाएं दिव्य धूप-

– मुकदमे या कर्जे की समस्या हो तो नौ दिन देवी के समक्ष गुग्गुल की सुगंध की धूप पान के पत्ते पर रखकर जलाएं.

– अपने मन की इच्छा पूरी करने के लिए माता काली के सामने बैठकर दुर्गा सप्तशती का पाठ भी उच्च स्वर में करें ऐसा लगातार 7 दिन करें.

नौकरी-व्यापार और धन की समस्या को खत्म करने के लिए करें दिव्य प्रयोग-

– 11 या 21 शुक्रवार मां कालिका के मंदिर जाएं.

– लाल आसन पर बैठकर ॐ क्रीं नमः 108 बार जपें.

– क्षमा मांगते हुए अपनी क्षमता अनुसार उन्हें चुनरी, नारियल, हार-फूल चढ़ाकर प्रसाद छोटी कन्याओं में बांटें.

– माता कालिका की पूजा में लाल कुमकुम, अक्षत, गुड़हल के लाल फूल और भोग में हलवे या दूध से बनी मिठाई भी अर्पण करें.

– पूरी श्रद्धा से मां की उपासना करें आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी. मां के प्रसन्न होते ही मां के आशीर्वाद से आपका जीवन बहुत ही सुखद होगा और नौकरी व्यापार और धन की समस्या तुरंत ही खत्म होगी.

Maha Kali

Maha Kali यंत्र माला

महाकाली वशीकरण मंत्र

माँ काली वशीकरण प्रयोगः मां काली के शक्तिशाली

मंत्र:

ओम ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं अमुकं वश्यं कुरु कुरु स्वाहा

का कुल सवा लाख जाप कुल 11 दिनों में पूरा किया जाता है। जाप की शुरुआत शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन से की जाती है तथा इसके लिए उपयुक्त समय प्रातः छह से सात बजे की बीच होना चाहिए। जाप संबंधी अनुष्ठान के लिए श्वेत वस्त्र का आसन लगाया जाता है तथा

जाप मुंगे /मोती माला व यंत्र सामने रक्ख कर किया जाना चाहिए।
अंतिम दिन दशांश हवन से साधना की पूर्णहुति होती है। उसके बाद मंत्र को किसी सफेद कागज के वर्गाकार टुकड़े पर लिखकर उसे यंत्र का रूप दे दिया जाता है। मंत्र में अमुकं की जगह वशीकरण किए जाने वाले व्यक्ति का नाम लिखकर उसे घी के बर्तन में डुबा दिया जाता है। जब तक वह घी में डूबा रहता है तब तक उस व्यक्ति पर वशीकरण का प्रभाव बना रहता है।

सरल वशीकरण प्रयोगः किसी व्यक्ति को अपने वश में करने के लिए मां काली की उपासना का फल मिलने वाला एक सरल वशीकरण उपाय है, जिसका प्रयोग कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को करना चाहिए। इस दिन मंगलवार हो तब और भी अच्छा है। इस सरल उपाय के लिए केवल कत्था लगा पान का पत्ता उपयोगी वस्तु है। जिस किसी व्यक्ति का वशीकरण किया जाना है उसका नाम लेकर निम्न मंत्र का जाप 100008 बार जाप कर के पहले सिद्ध कर लें ।

माँ काली मंत्रः

ओम ह्रीं क्लीं अमुकी क्लेदय क्लेदय आकर्षय आकर्षय,मथ मथ पच पच द्रावय द्रावय मम सन्निधि आनय आनय,हुं हुं ऐं ऐं श्रीं श्रीं स्वाहा।

इसमें अमुक के स्थान पर वशीकरण किए जाने वाले का नाम लिया जाना चाहिए। अंत में पान पर तीन फूंक मार दिया जाता है। इस तरह से अभिमंत्रित पान को मुंह में डालकर धीरे-धीरे चबाते हुए तब तक मंत्र का जाप पुनः किया जाता है, जब तक कि पान पूरी तरह से मुंह में घुल न जाए। उसके बाद थोड़ा पानी पीकर एक अन्य मंत्र का 108 बार जाप किया जाता है। वह मंत्र है—

क्लीं क्रीं हुं क्रों स्फ्रों कामकलाकाली स्फ्रों क्रों क्लीं स्वाहा।।

यह साधना बहुत ही चमत्कारी प्रभाव देती है तथा इसके लिए किसी भी तरह के माला की जरूरत नहीं होती है, लेकिन इसके प्रयोग के समय स्नान के बाद धुले हुए कपड़े पहने जाने चाहिए तथा आसपास के माहौल में शांति होनी चाहिए।


महाकाली हवन यज्ञ

महाकाली हवन यज्ञ

ग्यारह दिनों के बाद मन्त्रों का जाप करने के बाद दिए गये मन्त्र जिसका आपने जाप किया हैं उस मन्त्र का दशांश ( 10% भाग ) हवन अवश्य करें ! हवन में छोटी काली मिर्च, पांच मेवा, शुद्ध घी व् हवन सामग्री को मिलाकर आहुति दें ! हवन के बाद महाकाली यंत्र को अपने घर से दक्षिण दिशा की तरफ पड़ने वाले शिव मंदिर में दान कर दें और बाकि बची हुई पूजा सामग्री को नदी या किसी पीपल के नीचे विसर्जन कर आयें ! ऐसा करने से साधक की Mahakali Sadhana पूर्ण हो जाती हैं ! और साधक के ऊपर माँ महाकाली देवी की कृपा सदैव बनी रही हैं ! महाविद्या Mahakali Sadhana Vidhi कलियुग में कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फल देने वाली बताई गई हैं !

महाकाली हवन यज्ञ

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