महाकाली खडगमाला साधना
इस महाकाली खडगमाला साधना से पुत्र हीन को पुत्र, धनहीन को धन की प्राप्ति होती है। वह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों का अधिकारी होकर दूसरों को वर प्रदान करने वाला बन जाता है। आकर्षण शक्ति बढ जाती है। क्रोध शांत हो जाता है। अध्यात्मिक शक्ति बढ जाती है। शत्रु उसका कुछ भी बिगाड नही पाते। समस्त अरिष्ट ग्रह, भूत पिशाच आदि का प्रभाव नही होता। कहने का तात्पर्य यह है कि महाकाली की कृपा से उसके समस्त कार्य केवल विचार मात्र से ही पूर्ण हो जाते हैं।
महाकाली खडगमाला साधना सामग्री यंत्र स्थापित करके जाप करना चाहिए|
काली नित्यास
महाकाली का यंत्र स्थापना कर विधि पूर्वक पूजन जाप करना चाहिए|
ललिता की तरह , काली के भी पंद्रह नित्य या अनंत काल हैं, लेकिन ये बढ़ते चंद्रमा के बजाय घटते चंद्रमा से जुड़े हैं। ऊपर दिए गए यंत्र चित्र काली के जादू से लिए गए हैं और शक्तिसामंगन तंत्र के विवरण पर आधारित हैं ।
काली नित्य और मंत्र सकारात्मक हैं।
कलि : क्षीण चन्द्रमा की प्रथम नित्य
यद्यपि उसका नाम वही है, फिर भी वह कालिका से पृथक है, एक अवर्णा या परिचारिका के रूप में।
ध्यान: श्याम वर्ण, अत्यंत डरावनी, भयंकर रूप से चीखने वाली, दुर्जेय, खोपड़ियों की माला पहने, पूर्ण रूप से फूले हुए स्तन, दाहिने हाथ में छुरी और बाएं हाथ से धमकी भरा इशारा करती हुई, श्मशान में।
मंत्र: ॐ ह्रीं काली काली महाकाली कौमारी मह्यं देहि स्वाहा।
कपालिनी: दूसरा नित्य
उसके नाम का अर्थ है खोपड़ी-लड़की। ध्यान: काले, नग्न, सुंदर चेहरा, बिखरे बाल, चार कटे हुए सिरों पर बैठी, एक छुरी, त्रिशूल दिखाती हुई, वरदान देती हुई और भय को दूर करती हुई।
मंत्र: ॐ ह्रीं क्रीं कपालिनी महाकपालप्रियेमनसे कपालसिद्धिं मे देहि हुं फट् स्वाहा।
सहायक: आंतरिक त्रिभुज में इच्छा, क्रिया और ज्ञान। मध्य त्रिभुज में रति, प्रीति, कांति। बाहरी त्रिभुज में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव, आठ मातृका देवियाँ। भूपुर में दिशाओं के संरक्षक।
कुल्ला: तीसरा नित्य
कुल्ला
ध्यान: चार भुजाओं वाली, तीन आंखों वाली, एक शव के दस कटे सिरों पर बैठी हुई, अपने दो बाएं हाथों में वरदान देने और भय दूर करने की मुद्रा दर्शाती हुई, अपने दाहिने हाथों में वह एक पुस्तक और एक माला धारण किए हुए हैं।
मंत्र: ॐ क्रीं कुल्लय नमः।
परिचारिकाएँ: प्रथम त्रिभुज में धृति, पुष्टि, मेधा। द्वितीय त्रिभुज में तुष्टि, प्रज्ञा, जया। आठ पंखुड़ियों में आठ मातृकाएँ और भैरव, चार द्वारों में लोकपाल (प्रधान और मध्यवर्ती दिशाओं के संरक्षक)।
कुरुकुल्ला: चौथा नित्य
कुरुकुल्ला
ध्यान: बड़े उठे हुए स्तन, सुन्दर नितम्ब, काले रंग की, शव पर बैठी हुई, बिखरे हुए बाल, खोपड़ियों की माला पहने हुए, कपाल, कैंची, छुरी और ढाल लिए हुए।
मंत्र: क्रीं ओम कुरुकुल्ले क्रीं ह्रीं मम सर्व-जन-वासमन्य क्रीं कुरुकुल्ले ह्रीं स्वाहा।
परिचारिकाएँ: आंतरिक त्रिभुज में काली, तारा, छिन्नमस्ता। मध्य में बलम्बा, रागला, रमा। बाहरी त्रिभुज में उग्र-गर्भा, उग्र-बीज, उग्र-वीर्य। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव और आठ मातृकाएँ हैं, और लोकपाल दिशाओं में हैं।
विरोधिनी: पांचवां नित्य
विरोधिनि
ध्यान: पूर्ण उठे हुए वक्ष, सर्पों और हड्डियों की माला पहने हुए, भयानक, तीन नेत्रों और चार भुजाओं वाले, त्रिशूल, सर्प पाश, घंटी और डमरू धारण किए हुए। शव पर बैठे, पीले शरीर, बैंगनी वस्त्र।
मंत्र: ॐ क्रीं ह्रीं क्लीं हुं विरोधीनि शत्रुन्-उच्चतया विरोधी विरोधी शत्रु-क्षयकारी हुं फट।
सहायक: आंतरिक त्रिभुज में धूम्रचिरुष्मा, जावालिनी, विशफुलिंगिनी, मध्य में सुश्री, सुरूपा, कपिला। बाहरी में तीन शक्तियाँ हैं जिन्हें हव्यवाह, विरोधी-मस्तक, दशमी कहते हैं। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव और मातृकाएँ, भूपुर में लोकपाल।
विप्रचित्त: छठा नित्य
विप्रचित्त
ध्यान: उभरे हुए स्तन, चार भुजाएँ, तीन आँखें, नग्न, नीले कमल के समान रंग, बिखरे बाल, घूमती हुई जीभ, भय उत्पन्न करने वाली, हाथ में छुरी, कटा हुआ सिर, खोपड़ी की टोपी और त्रिशूल। वह अपने दाँत दिखाती है, उसके मुँह के कोने से खून बहता है।
मंत्र: ॐ श्रीं क्लीं चमुण्डे विपरीते दुष्टा-घातिनी शत्रुं-नाशय एतद्-दिन-वधि प्रिये सिद्धिम् मे देहि हुं फट् स्वाहा।
सहायक: बीजा के साथ बिन्दु, त्रिभुज में तीन गुण, षट्भुज में छह अंग, आठ पंखुड़ियों में मातृकाएं और भैरव, भूपुर में दिशाओं के रक्षक।
उग्र: सातवां नित्य
उगरा
ध्यान: नग्न, दुर्जेय, भयानक नुकीले दांतों के साथ, प्रत्यालीढ़ मुद्रा में पैर, खोपड़ियों की माला पहने हुए, बिखरे हुए बाल, काले, चार भुजाएं, एक तलवार, एक रात्रि कमल, एक खोपड़ी और एक चाकू पकड़े हुए, श्मशान भूमि में निवास करते हुए।
मंत्र: ॐ स्त्रीं हुं ह्रीं फट्।
परिचारिकाएँ: मध्य में हुं बीज, त्रिभुज में तारा, नील और एकजटा। आठ पंखुड़ियों में उग्र-घोप्र और शेष भैरव, बाहरी भाग में वैरोचन और शेष आठ मातृकाएँ, भूपुर में लोकपाल।
उग्रप्रभा: आठवां नित्य
उग्रप्रभा
ध्यान: चार भुजाएं, तीन आंखें, नीले कमल के समान रंग, शव पर बैठी, नग्न, बिखरे बाल, उभरे हुए स्तन, प्रसन्न मुख, सड़ा मांस खाती, शव के कटे हाथों की करधनी पहने, एक छुरी और एक सिर, एक खोपड़ी का कटोरा और एक चाकू पकड़े हुए।
मंत्र: ॐ हुं उग्रप्रभे देवि॰ काली महादेवी स्वरूपं दर्शय हुं फट् स्वाहा।
सहायक: प्रथम त्रिभुज में काली, तारा और रोचनी। बाहरी त्रिभुज में तारिणी-गण, तारामेकजटा और नील। आठ पंखुड़ियों में मातृकाएँ, पंखुड़ियों के शीर्ष पर आठ भैरव। भूपुर में लोकपाल।
दीपा नित्य: नौवां नित्य
ध्यान: चार भुजाएं, तीन नेत्र, बड़े नीलमणि के समान, खोपड़ियों की माला, नग्न, बिखरे बाल, भयानक नुकीले दांत, मानव हड्डी के बाजूबंद, खोपड़ियों के कंगन, बाएं हाथ में छुरी और सिर रखती हैं तथा दाहिने हाथ में भय दूर करने की मुद्राएं और देने की मुद्रा दर्शाती हैं।
मंत्र: ॐ क्रीं हुं दीप्तयै सर्व-मंत्र-फलादायै हुं फट् स्वाहा।
नीला: दसवां नित्य
नीला
ध्यान: चार भुजाएं, तीन नेत्र, नीले आभूषण के समान, खोपड़ियों का हार पहने हुए, शव पर बैठे, आंखें लाल और लुढ़कती हुई, उभरी हुई जीभ, मानव मांस और हड्डियों के आभूषण, सुंदर चेहरा, हिरण के समान आंखें।
मंत्र: हुं हुं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हसबलामारी नीलापताके हुं फट।
परिचारिकाएँ: त्रिभुज में कालरात्रि, महारात्रि, मोहरात्रि। षट्कोण में छह अंग। आठ पंखुड़ियों में आठ भैरव। कमल के आठ तंतुओं में आठ मातृकाएँ। भूपुर में वटुक नाथ आदि।
घाना, ग्यारहवाँ नित्य
घाना
ध्यान: चार भुजाएं, तीन आंखें, नग्नता में आनंदित, विकराल, डरावने दांत, सूजे हुए स्तन, काले, मुंह के कोनों से रक्त बहता है, वह मृत पुरुषों के हाथों की कमरबंद पहनती है, और एक तलवार, एक ढाल, एक त्रिशूल और एक गदा रखती है।
मंत्र: ॐ क्लीं ॐ घनालये घनालये ह्रीं हुं फट।
परिचारक: छह अंग छह कोणों में हैं, भैरव और मातृकाएं आठ पंखुड़ियों में हैं, और दिशाओं के रक्षक भूपुर में हैं।
बालक, बारहवें नित्य
ध्यान: चार भुजाएँ, तीन आँखें, मदिरा से मदहोश, खोपड़ियों की माला पहने, नग्न, विकराल, उभरे हुए स्तनों वाली, बाएँ हाथ में तलवार और सिर तथा दाएँ हाथ में खोपड़ी का कटोरा और धमकी देने वाली उँगली पकड़े हुए। खोपड़ियों के किले में बैठी हुई, वह दस लाख अग्नियों या सूर्यों के समान है।
मंत्र: ॐ क्रीं हुं ह्रीं बलाका काली अति अद्भुते पराक्रमे अभिस्ता सिद्धिं मे देहि हुं फट् स्वाहा।
मात्रा, तेरहवाँ नित्य
ध्यान: नीले-काले रंग का, नीले लेप से लिपटा हुआ, चार भुजाओं और तीन नेत्रों वाला, खोपड़ियों की माला पहने हुए, शव पर बैठा हुआ, भयंकर, खोपड़ी का कटोरा, कैंची, तलवार और कटा हुआ सिर लिए हुए। यह महान रौद्री भयंकर गर्जना करता है।
मंत्र: ॐ क्रीं हिम हुं ऐं १० महामात्रे सिद्धिं मे देहि सत्वरं हुं फट् स्वाहा।
मुद्रा, चौदहवाँ नित्य
मुद्रा
ध्यान: नग्न, नीले कमल के समान रंग, भयंकर, तीन भूरी आंखों वाली, चार भुजाएं, जोर से दहाड़ती हुई, मुंडों की माला, हाथों की करधनी, होठों पर रक्त, एक खोपड़ी का कटोरा और एक चाकू, एक तलवार और एक ढाल पकड़े हुए।
मंत्र: ॐ क्रीं हिम हुं प्रीं फ्रेम मुद्राम्ब मुद्रासिद्धिं मे देहिनी भो जगन्मुद्रास्वरूपिणी हुं फट् स्वाहा।
सहायक: त्रिभुज में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ हैं। राजयदा, भोगदा, मोक्षदा, जयदा, अभयदा, सिद्धिदा षटकोण में हैं। आठ मातृकाएँ आठ पंखुड़ियों में हैं, जिनके तंतुओं पर आठ भैरव हैं। भूपुर में गणप, योगिनियाँ, क्षेत्रपाल और वटुक नाथ हैं।
मीता, पंद्रहवीं नित्य
मिता
ध्यान: लाल वस्त्र, बिखरे बाल, उभरे हुए स्तन, सुन्दर नितम्ब, नग्नता में आनंद लेने वाली, भयानक, गहरे नीले रंग की, शव पर बैठी, खोपड़ियों की माला पहने, चार भुजाओं, तीन नेत्रों वाली, बाएं हाथ में तलवार और कटा हुआ सिर पकड़े, दाहिने हाथ से भय का नाश करने वाली तथा वरदान देने वाली। वह अंत समय में प्रलय की दस करोड़ अग्नियों के समान श्मशान में निवास करने वाली है।
मंत्र: ॐ क्रीं हुं ह्रीं ऐं मिते परमिते पराक्रमाय ॐ क्रीं हुं हिम ऐं सो-अहम हुं फट् स्वाहा।
परिचारिकाएँ: पहले त्रिभुज में काली, करालिनी, घोरा। दूसरे में वाम, ज्येष्ठा, रौद्रिका। तीसरे में इच्छा, ज्ञान, क्रिया। पहले भाग में वार्ताली, फिर लघुवराही, स्वप्नवराही, चौथे में तिरस्कारिणी। षटकोण में छह अंग, और आठ पंखुड़ियों में मातृकाएँ, तथा भूपुर में लोकपाल। मंत्र साधना विधि : मंत्र सिद्ध काली यँत्र स्थापना कर के मुंड माला से जाप करना चाहिए Contact
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